तकनीक पर बढ़ती निर्भरता से क्या इंसानी दिमाग हो रहा है बेकार
नई दिल्ली । डेस्क: आधुनिक दौर में स्मार्टफोन, ऐप्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बढ़ती इंसानी निर्भरता ने हमारी प्राकृतिक शारीरिक और मानसिक क्षमताओं पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. किसी ज़माने में जिन जानकारियों, फोन नंबरों, तारीखों और गणितीय तालिकाओं को याद रखने के लिए इंसान अपने दिमाग का नियमित इस्तेमाल करता था, वे सभी काम अब पूरी तरह से डिजिटल गैजेट्स के हवाले हो चुके हैं.
मैपिंग, खरीदारी, समय देखने और यहाँ तक कि डॉक्टरों द्वारा की जाने वाली नैदानिक प्रक्रियाओं तक में ऑटोमेशन का बोलबाला है. विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह विकासक्रम (Evolution) के दौरान जिन अंगों का इस्तेमाल बंद हो गया-जैसे पूँछ या अपेंडिक्स-वे धीरे-धीरे निष्क्रिय या लुप्त होते चले गए, ठीक उसी तरह मानसिक गतिविधियों से दूरी बनाने के कारण इंसानी दिमाग के भी अपक्षय (Atrophy) का खतरा बढ़ता जा रहा है.
मानव सभ्यता के इतिहास पर नज़र डालें तो इंसानों की सर्वोच्च सफलता का मुख्य आधार उनकी मौलिक सोचने-समझने की क्षमता और आपस में संवाद स्थापित करना ही रहा है. इसी क्षमता के बल पर इंसान ने विपरीत परिस्थितियों और खुद से शक्तिशाली जीवों पर विजय पाई.
हालांकि, मौजूदा डिजिटल युग में सोशल मीडिया और सर्च एल्गोरिदम व्यक्ति को केवल उसकी पहले से मौजूद पसंद का ही कंटेंट परोस रहे हैं, जिससे नए विचारों को ग्रहण करने और कल्पनाशीलता के विकसित होने के अवसर सिमटते जा रहे हैं.
इसके साथ ही, आमने-सामने बैठकर बात करने और विचारों का आदान-प्रदान करने की पुरानी संस्कृति तेजी से खत्म हो रही है. लोग वास्तविक संवाद के बजाय डिजिटल पर्दे के पीछे रहकर अनजान लोगों के साथ समय बिताना अधिक पसंद कर रहे हैं.
मौलिक सोच और संवाद जैसी विशिष्ट इंसानी दक्षताओं के कम होने से भविष्य में मानव बौद्धिक क्षमता के गंभीर रूप से प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है. यदि तकनीक के इस अत्यधिक उपयोग के बीच सोचने, मिलने और संवाद करने की परंपरा को फिर से जीवित नहीं किया गया, तो जिस दिमाग ने AI और मशीनों का निर्माण किया है, वह खुद अपनी प्रासंगिकता खोने के मुहाने पर आ खड़ा होगा.