आदिवासियों की जिंदगी निगल रहा लौह अयस्क का कचरा
छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर के आदिवासियों की जिंदगी को तबाह करता लौह अयस्क का कचरा
दंतेवाड़ा | संवाददाताः छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर के इलाके में लौह अयस्क की खदानों के कचरे ने ग्रामीणों की जिंदगी को संकट में डाल दिया है. इस धूल वाले कचरे के कारण हरे-भरे पेड़ पौधे सूखते जा रहे हैं.
आदिवासियों के सामने मुश्किलें गहरा रही हैं. ज़मीन में भी जहर घुल रहा है और हवा में भी.
दक्षिण बस्तर यानी दंतेवाड़ा के इलाके में आर्सेलर मित्तल निप्पॉन लिमिटेड लौह अयस्क कंपनी का धूल वाला कचरा अब ग्रामीणों के लिए अभिशाप बन चुका है.
पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर जल स्रोतों में इस कचरे को डाला जा रहा है.
कहीं नदियों के किनारे, इस कचरे को भरा जा रहा है तो कहीं नाले और दूसरे जलाशय पाटे जा रहे हैं.
ज़िला प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है और जिस पर्यावरण संरक्षण मंडल को, इस मामले में कार्रवाई करनी थी, उसका कहीं अता-पता नहीं है.
कचरे के प्रभाव से सूख रहे दरख्त
दंतेवाड़ा से महज छह किमी दूर स्थित कुंदेली पंचायत में करीब 10 एकड़ जमीन में इस कंपनी ने डस्ट का डंप कर दिया है.
ग्रामीणों का जीना मुहाल हुआ तो उन्होंने विरोध किया. तमाम विरोध के बाद कंपनी ने इस क्षेत्र में अपशिष्ट पदार्थ को डालना बंद किया.
इस लाल मिट्टी को जिस क्षेत्र में डाला गया है, वहां सैकड़ों साल पुराने पेड़ सूख गए.
पानी को स्रोतों को कचरे से पाट रही कंपनी
आर्सेलर मित्तल निप्पॉन लिमिटेड कंपनी को लेकर ग्रामीणों का आरोप है कि खदानों से निकले हुए अपशिष्ट पदार्थ को खपाने के लिए कंपनी नदी-नालों और तलाबों का किनारा भी नहीं छोड़ रही है.
इन सभी जगहों में इसी कचरे का भराव किया जा रहा है.
हालत ये है कि डंकनी-शंखनी के तट को हजारों ट्रक लाल मिट्टी से पाट दिया गया है.
एनजीटी के आदेश को ताक पर रखा
जबकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (भोपाल बेंच) ने 15 जुलाई 2024 को डंकनी -शंखनी नदी तट पर आयरन ओर के टेलिंग्स डंप के सबंध में आदेश दिए थे कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 का कड़ाई से पालन किया जाए.
ग्रामीणों का कहना है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के नियम-कायदे और निर्देश को हाशिये पर डाल दिया गया है और ज़िला प्रशासन भी मौन है.
आदिवासियों का आरोप है कि ग्रामीणों के विरोध के बावजूद कंपनी लगातार मनमानी कर रही है और उपजाऊ भूमि को बंजर बनाया जा रहा है.
आदेश में लिखा गया कि हम निर्देश देते है कि ठोस अपशिष्ट निपटान के लिए जारी दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए.
प्रबंधन नियम, 2016 का कड़ाई से अनुपालन किया जाना चाहिए और जल निकायों में जल प्रबंधन नियम, 2016 का कड़ाई से अनुपालन किया जाना चाहिए.
नदी का उपयोग पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन करते हुए भूमि भरने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
पुलिस लाइन से लेकर नदी के तट तक कचरे का भराव
लैंडफिल साइट नदी से 100 मीटर दूर, तालाब से 200 मीटर, राज्य मार्गो, बस्तियों, सार्वजनिक पार्कों और जल आपूर्ति कुओं से 200 मीटर और हवाई अड्डों या एयरबेस से 20 किमी दूरी होना चाहिए.
लेकिन इसके बाद भी लगातार कचरे की डंपिंग की जा रही है.
एसपी कार्यालय के पीछे ही टेलिंग्स को डंप करवाया जा रहा है. इतना ही नहीं, पुलिस लाइन कारली में भी अपशिष्ट पदार्थ का भराव करवाया गया है.
ये सभी भराव नदी तट पर अभी भी चल रहे हैं.
नगरपालिका सीएमओ को नहीं मालूम
नगरपालिका के वार्ड क्रमांक 12 में उपजाऊ भूमि को खोद कर कंपनी का कचरा डंप किया जा रहा है.
इस सबंध में दंतेवाड़ा नगरपालिका सीएमओ से जब हमारे संवाददाता ने जानकारी लेनी चाही तो उन्होंने कहा कि इस विषय पर अभी कुछ नहीं बोल सकता हूं. पिछले कार्यकाल के दौरान का मामला है, एनओसी ली गई कि नहीं देख कर ही कुछ बता पाऊंगा.
औद्योगिक घराने सिर्फ बस्तर को लूटने आए हैं
इधर पूर्व नगर पालिका उपाध्यक्ष और भाजपा के जिला महामंत्री धीरेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं वार्ड क्रमांक 12 के अवशिष्ट पदार्थ को डंप करने का परिषद की बैठक में कोई मामला नहीं आया था. यदि सीएमओ ने एनओसी दी है तो जांच होनी चाहिए. बिना परिषद की बैठक के इतना बड़ा फैसला नहीं लिया जा सकता है.
उन्होंने कहा कि इस प्रकरण को सरकार के संज्ञान में लाऊंगा और कलेक्टर से भी चर्चा करूंगा.
कांग्रेस के जिला महामंत्री और नगरपालिका के पार्षद मनीष भट्टाचार्य कहते हैं कि दंतेवाड़ा में लाल मिट्टी ने कई विवाद करवा दिए है. पूरे नगर में टेलिंग्स को डंप किया जा रहा है और शासन-प्रशासन मौन है. यदि नियम विरुद्ध पालिका में हुआ है तो सीएमओ को परिषद की बैठक में जबाब देना होगा.
उन्होंने कहा कि औद्योगिक घरानों को किसी से मतलब नहीं है, वे तो सिर्फ बस्तर को लूटने आए हैं.
ऐसा ही चलता रहा तो होगा बड़ा आंदोलन- सोरी
सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी का आरोप है कि इस लौह अयस्क के डस्ट से पूरा दक्षिण बस्तर परेशान है. लोगों के खेत बर्बाद हो रहे हैं. कंपनी तो आपस में विवाद करवा रही है. कंपनी लौह अयस्क के डस्ट से सिर्फ पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य में जहर नहीं घोल रही, बल्कि ग्रामीणों के बीच भाईचारे को भी निगल रही है.
सोनी सोरी का आरोप है कि कंपनी में काम करने वाले ग्रामीण और कंपनी की मनमानी का विरोध करने वाले ग्रामीणों के बीच तकरार भी देखने को मिल रही है. कंपनी गांव के लोगों को ही काम देती है. इसके बाद अन्य ग्रामीण परेशान होते हैं तो आपस में विवाद होता है.
उन्होंने कहा कि कुआकोंडा के टिकनपाल में तो आपस में लाठी-डंडा और चाकू- छूरियां तक चल गईं. सडक़ों को भी ओव्हर लोड ट्रक नुकसान पहुंचा रहे हैं. इस बस्तर में खनन तो बंद नहीं होगा लेकिन इस अपशिष्ट पदार्थ का जब तक सुरक्षित निराकरण नहीं होता तब तक खनन बंद कर देना चाहिए.
विकास का दंश झेलते इन ग्रामीणों की नज़रों से देखें तो यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि यह कथित विकास किसकी कीमत पर और किसके लिए हो रहा है? ऐसे सवाल एक गंभीर विडबंना में बदल जाते हैं, जब आदिवासी इस कथित विकास की मार झेल रहे हों और राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी कोई आदिवासी ही बैठा हो.