ईरान-अमेरिका वार्ता: $100 अरब की फ्रीज संपत्ति बनी गले की फांस
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से दूसरे दौर की वार्ता की सुगबुगाहट तेज हो गई है. लेकिन इस कूटनीतिक मेज पर सबसे बड़ा रोड़ा ईरान की वह संपत्ति है, जो दशकों से दुनिया के अलग-अलग देशों के बैंकों में 'फ्रीज' यानी जमी हुई है. ईरान का स्पष्ट कहना है कि जब तक उसकी मेहनत की कमाई उसे वापस नहीं मिलती, तब तक बातचीत के कोई मायने नहीं हैं.
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कोई नया नहीं है. इसकी शुरुआत 1979 की इस्लामी क्रांति और तेहरान में अमेरिकी दूतावास में बंधक बनाए गए नागरिकों के संकट से हुई थी. तब से लेकर अब तक, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों के कारण अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं.
इन प्रतिबंधों का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि ईरान को अपने तेल निर्यात से होने वाली कमाई और विदेशों में जमा अपनी संपत्तियों तक पहुंचने से रोक दिया गया. 10 अप्रैल को पाकिस्तान में पहले दौर की बातचीत से पहले, ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर घालिबाफ ने सोशल मीडिया पर साफ कर दिया कि किसी भी बातचीत से पहले इन संपत्तियों को मुक्त करना अनिवार्य है?
हालांकि ईरान की फ्रीज संपत्तियों का कोई एक सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों और ईरानी आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, यह राशि $100 अरब (करीब 100 बिलियन डॉलर) से अधिक है.
मिडल ईस्ट काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स के सीनियर फेलो फ्रेडरिक श्नाइडर के अनुसार, यह राशि ईरान की वार्षिक हाइड्रोकार्बन कमाई से लगभग चार गुना अधिक है. एक ऐसा देश जो दशकों से प्रतिबंधों की मार झेल रहा है, उसके लिए यह रकम किसी संजीवनी से कम नहीं है.
हालांकि, अमेरिका इन संपत्तियों को छोड़ने के बदले में सख्त शर्तें रखना चाहता है, जिसे लेकर ईरान हमेशा से सशंकित रहा है.
किन देशों में फंसा है ईरान का पैसा?
ईरान की यह विशाल संपत्ति दुनिया के कई कोनों में बिखरी हुई है:
चीन: लगभग $20 अरब (सबसे बड़ी हिस्सेदारी).
भारत: करीब $7 अरब.
इराक: लगभग $6 अरब.
दक्षिण कोरिया/कतर: $6 अरब (जो पहले दक्षिण कोरिया में थे, फिर कतर भेजे गए लेकिन फिर से ब्लॉक कर दिए गए).
जापान: $1.5 अरब.
अमेरिका और यूरोपीय संघ: अमेरिका में लगभग $2 अरब और लक्जमबर्ग जैसे देशों में $1.6 अरब सीधे तौर पर फ्रीज हैं.
प्रतिबंधों का इतिहास: ओबामा से लेकर ट्रंप तक
ईरान की संपत्तियों के साथ 'चूहे-बिल्ली' का खेल लंबा चला है. 1981 में अल्जीयर्स समझौते के बाद कुछ राहत मिली थी, लेकिन परमाणु विवाद ने स्थिति फिर बिगाड़ दी.
2015 का परमाणु समझौता (JCPOA): ओबामा प्रशासन के दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति जताई, जिसके बदले उसे उसकी संपत्तियों तक पहुंच दी गई.
2018 में ट्रंप की वापसी: डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को 'एकतरफा' बताते हुए हाथ खींच लिए और फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिससे संपत्तियां दोबारा फ्रीज हो गईं.2023 का कैदी विनिमय: जो बाइडन प्रशासन के दौरान एक कैदी विनिमय सौदे के तहत $6 अरब की राशि दक्षिण कोरिया से कतर भेजी गई थी, लेकिन 2024 में ईरान के इजरायल पर हमले के बाद अमेरिका ने इसे फिर से ब्लॉक कर दिया.
ईरान के लिए यह पैसा क्यों है जरूरी?
ईरान वर्तमान में अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है. मुद्रास्फीति आसमान छू रही है और उनकी मुद्रा 'रियाल' की कीमत लगातार गिर रही है. दिसंबर 2025 में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के पीछे भी मुख्य कारण आर्थिक तंगी ही थी.
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रोक्सेन फरमानफरमैयान के अनुसार, $100 अरब की यह राशि ईरान की जीडीपी का लगभग एक चौथाई है. यदि यह पैसा मिलता है, तो ईरान:
अपनी गिरती मुद्रा को संभाल सकेगा.
बुनियादी ढांचे जैसे बिजली ग्रिड, जल प्रणाली और तेल क्षेत्रों का आधुनिकीकरण कर पाएगा.
युद्ध के बाद देश के पुनर्निर्माण में तेजी ला सकेगा.
विदेशी निवेश को आकर्षित कर भ्रष्टाचार और कालाबाजारी को कम कर सकेगा.
कूटनीतिक संदेश और भविष्य की राह
22 अप्रैल को मौजूदा युद्धविराम की समाप्ति से पहले होने वाली यह वार्ता अत्यंत महत्वपूर्ण है.
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका इन संपत्तियों को अनफ्रीज करता है, तो यह दुनिया के लिए एक बड़ा कूटनीतिक संकेत होगा कि अमेरिका ईरान पर दबाव कम करने को तैयार है.
हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के अनिश्चित कूटनीतिक रुख और इजरायल-ईरान के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि ऊंट किस करवट बैठेगा. फिलहाल, ये $100 अरब डॉलर ही तय करेंगे कि खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल होगी या युद्ध की आग और भड़केगी.