ईरान के कद्दावर नेता अली लारीजानी की हवाई हमले में मौत
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान के सबसे प्रभावशाली और रणनीतिक कौशल के धनी नेताओं में शुमार अली लारीजानी की एक हवाई हमले में मौत हो गई है. जिसने मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को एक अत्यंत खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया है. ईरानी सरकारी मीडिया ने मंगलवार देर रात इस खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि लारीजानी, जो देश की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव थे, इजरायली हमले का निशाना बने.
यह घटनाक्रम तब सामने आया जब इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि 67 वर्षीय लारीजानी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे सैन्य अभियान के दौरान एक रात भर चले सटीक हमले में मार दिया गया है. लारीजानी की मौत के साथ ही ईरान की अर्धसैनिक बल 'बसिज' के प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल गुलामरेजा सुलेमानी के भी एक अलग हमले में मारे जाने की खबरें हैं, जो ईरानी रक्षा तंत्र के लिए एक बहुत बड़ा दोहरा झटका माना जा रहा है.
अली लारीजानी को आखिरी बार सार्वजनिक रूप से पिछले शुक्रवार को तेहरान में अल-कुद्स दिवस की परेड के दौरान देखा गया था, जहाँ उन्होंने इजरायल और अमेरिका के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था.अली लारीजानी का मारा जाना ईरान के लिए इसलिए भी बड़ा आघात है क्योंकि वे 28 फरवरी को युद्ध के पहले ही दिन मारे गए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के बाद अब तक के सबसे उच्च पदस्थ अधिकारी थे.
खामेनेई की मृत्यु के बाद उपजे नेतृत्व के संकट के दौरान लारीजानी ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने ईरान की सुरक्षा रणनीति और शासन की निरंतरता को बनाए रखने में एक 'सेतु' की भूमिका निभाई थी. दशकों तक लारीजानी को ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान का एक शांत, व्यावहारिक और बौद्धिक चेहरा माना जाता था. वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक दार्शनिक भी थे, जिन्होंने 18वीं सदी के जर्मन विचारक इमैनुएल कांट पर शोध किया था और वर्षों तक पश्चिम के साथ परमाणु समझौतों की मेज पर ईरान का पक्ष रखा था.
हालांकि, 1 मार्च को खामेनेई की हत्या के बाद उनके तेवर पूरी तरह बदल गए थे. उन्होंने सरकारी टेलीविजन पर भावुक और उग्र संदेश देते हुए कसम खाई थी कि ईरान इन 'अपराधियों' को कभी माफ नहीं करेगा और अमेरिकी व इजरायली सेना को ऐसा सबक सिखाएगा जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे.
लारीजानी का जन्म 1958 में इराक के नजफ में एक प्रतिष्ठित और रसूखदार परिवार में हुआ था. उनके परिवार का प्रभाव इतना व्यापक था कि 2009 में टाइम पत्रिका ने उन्हें "ईरान का कैनेडी परिवार" करार दिया था. उनके पिता एक प्रमुख धार्मिक विद्वान थे और उनके भाई न्यायपालिका तथा विशेषज्ञ परिषद जैसे शक्तिशाली संस्थानों में उच्च पदों पर रहे हैं.
लारीजानी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी काफी विविध थी. उन्होंने शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी से गणित और कंप्यूटर साइंस में स्नातक किया और बाद में दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. उनका राजनीतिक सफर 1980 के दशक में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) से शुरू हुआ, जिसके बाद उन्होंने संस्कृति मंत्री और सरकारी प्रसारक IRIB के प्रमुख के रूप में भी सेवा दी.
2008 से 2020 तक लगातार तीन बार संसद के अध्यक्ष रहने के दौरान उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) को मंजूरी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसे उनकी कूटनीतिक जीत माना जाता था. अगस्त 2025 में राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन द्वारा फिर से सुरक्षा प्रमुख नियुक्त किए जाने के बाद लारीजानी का रुख परमाणु मामले पर काफी सख्त हो गया था. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ सहयोग समझौतों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि अब इन रिपोर्टों का कोई महत्व नहीं रह गया है.
इसके बावजूद, युद्ध छिड़ने से कुछ हफ्ते पहले तक वे ओमान के माध्यम से अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष बातचीत में शामिल थे, जहाँ उन्होंने कूटनीति को एक 'तर्कसंगत मार्ग' बताया था. लेकिन खामेनेई की मौत के बाद उन्होंने बातचीत के सभी दरवाजे बंद कर दिए और अमेरिकी सैनिकों को पकड़ने या मारने की खुली धमकी दी.
विश्लेषकों का मानना है कि लारीजानी की मृत्यु से ईरान के रणनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है. वे सुरक्षा तंत्र, सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी थे. उनकी कमी न केवल युद्ध के संचालन को प्रभावित करेगी, बल्कि भविष्य में किसी भी संभावित तनाव कम करने की प्रक्रिया को भी कठिन बना देगी.
इस समय जब ईरान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, लारीजानी जैसे अनुभवी रणनीतिकार का जाना उसके लिए अपूरणीय क्षति है.