ईरान-परमाणु विवाद: यूरेनियम संवर्धन की समय सीमा पर उलझा संघर्ष विराम
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशें एक बार फिर परमाणु कार्यक्रम के पुराने विवादों की भेंट चढ़ती नजर आ रही हैं. पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में आयोजित उच्च स्तरीय वार्ता किसी नतीजे पर पहुंचे बिना समाप्त हो गई है, जिसका मुख्य कारण यूरेनियम संवर्धन की भविष्य की अवधि को लेकर पैदा हुआ गहरा मतभेद है.
जहां व्हाइट हाउस ईरान के परमाणु भविष्य पर दो दशकों के लिए ताला लगाना चाहता है, वहीं तेहरान अपनी संप्रभुता का हवाला देते हुए चंद वर्षों से अधिक की रोक स्वीकार करने को तैयार नहीं है. इस गतिरोध ने न केवल एक संभावित परमाणु समझौते को खतरे में डाल दिया है, बल्कि चल रहे सैन्य संघर्ष के बीच एक स्थायी युद्ध विराम की उम्मीदों को भी धूमिल कर दिया है.
यूरेनियम संवर्धन की तकनीकी जटिलता और खतरा
परमाणु विज्ञान के नजरिए से यूरेनियम संवर्धन एक ऐसी प्रक्रिया है जो नागरिक ऊर्जा और सैन्य हथियारों के बीच एक बहुत ही धुंधली रेखा खींचती है. प्राकृतिक यूरेनियम में रेडियोधर्मी आइसोटोप U-235 की मात्रा बेहद कम होती है, जिसे बिजली घरों के लिए 20 प्रतिशत से नीचे और परमाणु बम बनाने के लिए 90 प्रतिशत से ऊपर तक ले जाना पड़ता है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की हालिया चेतावनियां इस तनाव का मुख्य आधार हैं.
यह माना जा रहा है कि ईरान ने पहले ही 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का एक विशाल भंडार तैयार कर लिया है. तकनीकी विशेषज्ञों का तर्क है कि 60 प्रतिशत से 90 प्रतिशत (हथियार-ग्रेड) के स्तर तक पहुंचने में लगने वाला समय अब बहुत ही कम रह गया है. यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन इसे केवल एक ऊर्जा कार्यक्रम न मानकर एक आसन्न सुरक्षा खतरे के रूप में देख रहा है.
वार्ता की विफलता और समय सीमा का संघर्ष
इस्लामाबाद में हुई चर्चा के दौरान सबसे बड़ा अड़ंगा उस समय आया जब अमेरिका ने मांग रखी कि ईरान अगले 20 वर्षों तक अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह स्थगित रखे. अमेरिका का तर्क है कि इतनी लंबी अवधि का निलंबन यह सुनिश्चित करेगा कि ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता स्थायी रूप से कमजोर हो जाए. इसके विपरीत, ईरानी वार्ताकारों ने केवल पांच वर्ष की अवधि का प्रस्ताव दिया है.
ईरान का कहना है कि वह लंबे समय तक अपने वैज्ञानिक और ऊर्जा अधिकारों को गिरवी नहीं रख सकता. यह पांच और बीस साल की खींचतान केवल अंकों का खेल नहीं है, बल्कि यह उस अविश्वास को दर्शाता है जो दशकों से इन दोनों देशों के बीच बना हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों ही पक्ष अपने घरेलू राजनीतिक हितों को साधने के लिए इस समय सीमा को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख इस बार पहले के मुकाबले कहीं अधिक आक्रामक नजर आ रहा है. साल 2018 में जब उन्होंने परमाणु समझौते (JCPOA) से हाथ खींचा था, तब उनका मुख्य आरोप यही था कि समझौते की अवधि बहुत कम है और यह ईरान को भविष्य में परमाणु शक्ति बनने से नहीं रोकता. अब, युद्ध के बीच चल रही इन वार्ताओं में भी वे उसी 'बेहतर डील' की तलाश में हैं जो ईरान की परमाणु कमर पूरी तरह तोड़ सके.
अमेरिका ने न केवल आर्थिक प्रतिबंधों का सहारा लिया है, बल्कि सैन्य हमलों के जरिए ईरान के मुख्य परमाणु ठिकानों जैसे नतांज और इस्फहान को भी भारी नुकसान पहुंचाया है. रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन अब विशेष बलों के जरिए ईरान के मौजूदा संवर्धित यूरेनियम भंडार को अपने नियंत्रण में लेने की योजना पर भी विचार कर रहा है, जो कूटनीति के लिए एक बेहद खतरनाक संकेत है.
कूटनीतिक भविष्य और युद्ध विराम पर प्रभाव
इस परमाणु विवाद का सीधा असर युद्ध विराम की कोशिशों पर पड़ रहा है. अमेरिका के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल ही में कहा था कि गेंद अब ईरान के पाले में है, जिसका अर्थ है कि जब तक ईरान परमाणु मोर्चे पर झुकता नहीं, तब तक युद्ध की समाप्ति संभव नहीं दिखती.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह छोड़ना एक राष्ट्रीय हार की तरह होगा, जबकि ट्रंप के लिए इस कार्यक्रम को लंबे समय तक बंद कराना एक बड़ी युद्ध जीत के समान होगा.
पाकिस्तान अब दोनों पक्षों को दूसरे दौर की बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन संवर्धन की अवधि पर बढ़ती यह जिद इस विवाद को और अधिक लंबा खींच सकती है. जब तक यूरेनियम की इन घुमावदार मशीनों (सेंट्रीफ्यूज) पर सहमति नहीं बनती, तब तक मध्य पूर्व के आसमान से युद्ध के बादल छंटना मुश्किल नजर आ रहा है.