महिलाओं से जुड़े मामलों में लैंगिक रूप से संवेदनशील भाषा के निर्देश
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य की न्यायिक प्रक्रिया और पुलिस जांच में महिलाओं की गरिमा को सर्वोपरि रखते हुए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. अब यौन अपराधों और महिलाओं से संबंधित किसी भी मामले में अपमानजनक, पारंपरिक या रूढ़िवादी शब्दों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है.
हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन, निचली अदालतों और संबंधित सरकारी विभागों को निर्देश दिया है कि प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने से लेकर अंतिम अदालती फैसले तक केवल लैंगिक रूप से संवेदनशील और तटस्थ शब्दावली का ही प्रयोग किया जाए. सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय समिति की सिफारिशों के अनुरूप यह व्यवस्था पूरे राज्य में लागू की जा रही है.
इस नए आदेश के तहत विधिक और प्रशासनिक दस्तावेजों से ‘अस्मत’ और ‘शील भंग’ जैसे पारंपरिक शब्दों को हटाकर उनके स्थान पर ‘यौन हमला’ या ‘शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन’ जैसे स्पष्ट शब्दों का उपयोग होगा.
इसी तरह, मामलों की सुनवाई और रिपोर्टिंग के दौरान पीड़िता के लिए संदर्भानुसार ‘सर्वाइवर’, ‘विक्टिम’ या ‘शिकायतकर्ता’ जैसे सम्मानजनक संबोधनों का चयन किया जाएगा.
अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए ‘चरित्रहीन’, ‘लाचार महिला’ या ‘वेश्या’ जैसे अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है, और यह स्पष्ट किया है कि किसी भी महिला का पहनावा, उसका चरित्र या व्यक्तिगत जीवन न्यायिक निर्णय का आधार नहीं बनेगा; फैसले केवल निष्पक्ष साक्ष्यों और कानून के दायरे में ही दिए जाएंगे.
पीड़िताओं और गवाहों को किसी भी सामाजिक दबाव या सार्वजनिक टीका-टिप्पणी से बचाने के लिए संवेदनशील मामलों की सुनवाई बंद कमरे (इन-कैमरा) में कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया है, जिससे उनकी निजता पूरी तरह सुरक्षित रहे.
इस फैसले का त्वरित और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए उच्च न्यायालय ने प्रदेश के सभी 24 जिला एवं सत्र न्यायालयों, गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक (DGP), राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और महिला एवं बाल विकास विभाग को आदेश की प्रतियां भेजकर दिशा-निर्देशों का तत्काल पालन करने के आदेश जारी किए हैं.