लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी: उत्तर भारत को 200 और दक्षिण को सिर्फ 66 सीटों का लाभ- कांग्रेस
नई दिल्ली । डेस्क: कांग्रेस पार्टी ने केंद्र की मोदी सरकार पर देश के राजनीतिक ढांचे को बदलने का आरोप लगाते हुए एक बड़ा दावा किया है, जिससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सत्ता के संतुलन को लेकर नई बहस छिड़ गई है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आंकड़ों के साथ सरकार की प्रस्तावित योजना पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि लोकसभा की सीटों में 50 प्रतिशत की एकमुश्त वृद्धि की जाती है, तो इसका सबसे बड़ा लाभ उत्तर भारत के राज्यों को मिलेगा.
रमेश के अनुसार, इस फॉर्मूले के लागू होने पर उत्तर भारतीय राज्यों की झोली में कुल 200 अतिरिक्त सीटें आएंगी, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों के हिस्से में केवल 66 सीटों का ही इजाफा होगा. कांग्रेस का तर्क है कि यह असमानता दक्षिण भारत के उन राज्यों के साथ सरासर अन्याय है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण और विकास के मानकों पर बेहतर प्रदर्शन किया है, क्योंकि सीटों की इस भारी वृद्धि से संसद में दक्षिण का प्रतिनिधित्व उत्तर की तुलना में और भी कम हो जाएगा.
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के माध्यम से विस्तार से समझाया कि यह वृद्धि किस प्रकार राज्यों के बीच की खाई को बढ़ाएगी.
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश के पास 80 सीटें हैं, जो प्रस्तावित विधेयक के बाद बढ़कर 120 हो जाएंगी. इसके विपरीत, तमिलनाडु की 39 सीटें बढ़कर मात्र 59 तक ही पहुंच पाएंगी. इसी तरह, बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 60 हो जाएंगी, जबकि केरल जैसे राज्य की सीटों की संख्या 20 से बढ़कर केवल 30 ही हो पाएगी.
कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एकतरफा तरीके से ऐसा कानून लाने की तैयारी कर रहे हैं जो दक्षिण के साथ-साथ पूर्वोत्तर और पश्चिमी भारत के छोटे राज्यों को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल देगा.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने इस मुद्दे पर पहले ही कड़ा विरोध दर्ज कराया है और कांग्रेस का मानना है कि जैसे ही यह प्रस्ताव आधिकारिक रूप से सार्वजनिक होगा, देश के अन्य हिस्सों से भी विरोध के स्वर उठने शुरू हो जाएंगे.
कांग्रेस महासचिव ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे "बुलडोजर" राजनीति करार दिया है. उन्होंने कहा कि सरकार बिना किसी व्यापक विमर्श के लोकसभा और विधानसभाओं के आकार को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का मन बना चुकी है.
पार्टी ने इस कदम को एक "जन-भटकाव का हथियार" बताया है, जिसका उद्देश्य देश के मौजूदा आर्थिक संकट, एलपीजी की कीमतों और ऊर्जा संकट जैसे बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान हटाना है.
इसके अलावा, कांग्रेस ने महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर भी सरकार को घेरा है. पार्टी का दावा है कि सरकार अब बिना जनगणना और बिना परिसीमन के ही इस कानून को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना चाहती है, जो कि उनके पिछले स्टैंड से पूरी तरह विपरीत है.
विपक्ष का कहना है कि सरकार की यह जल्दबाजी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन है और यह देश के संघीय ढांचे की जड़ों पर प्रहार करने जैसा है, जिससे राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का असंतुलन एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बन सकता है.