यदि ईरान ने सरेंडर नहीं किया तो ट्रंप अपने ही जाल में फंस जायेंगे
वाशिंगटन । डेस्क: ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल द्वारा छेड़े गए भीषण सैन्य अभियान ने मध्य पूर्व को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ से वापसी का रास्ता केवल विनाश या राजनीतिक हार की ओर जाता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जिस 'तख्तापलट' (रिजीम चेंज) का लक्ष्य रखा है, वह अब उनके लिए एक दोधारी तलवार साबित हो सकता है.
व्हाइट हाउस ने यह हमला उस समय किया जब कूटनीति के सफल होने की उम्मीद जताई जा रही थी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि शांति वार्ता केवल युद्ध की तैयारी के लिए एक छलावा थी. अब ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि ईरान ने तुरंत घुटने नहीं टेके, तो वे अपने ही बुने हुए चक्रव्यूह में फंस जाएंगे.
ट्रंप ने ईरान के भीतर नेतृत्व को खत्म करने के लिए 'डीकैपिटेशन स्ट्राइक्स' का सहारा लिया है और अयातुल्ला खामेनेई व राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान के परिसरों को निशाना बनाया है, लेकिन इतिहास गवाह है कि केवल हवाई हमलों से सत्ता परिवर्तन संभव नहीं होता. यदि ईरान का शीर्ष नेतृत्व बच निकलता है और प्रतिरोध जारी रखता है, तो ट्रंप एक अंतहीन युद्ध में फंस जाएंगे, जिससे बाहर निकलना उनके लिए राजनीतिक रूप से नामुमकिन हो जाएगा.
इस युद्ध की सबसे कमजोर कड़ी खुद अमेरिका के भीतर से उभर रही है, क्योंकि अमेरिकी जनता एक और विदेशी संघर्ष के पक्ष में बिल्कुल नहीं है. हालिया सर्वे बताते हैं कि केवल 21 से 27 प्रतिशत अमेरिकी ही ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन करते हैं.
ट्रंप ने यह दांव ऐसे समय में खेला है जब अमेरिका में मध्यावधि चुनाव नजदीक हैं. यदि युद्ध लंबा खिंचता है और अमेरिकी सैनिकों की क्षति होती है, तो इसका सीधा असर रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ेगा.
यदि कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत आता है, तो ट्रंप न केवल अपने राजनीतिक एजेंडे को खो देंगे, बल्कि उन पर महाभियोग का खतरा भी मंडराने लगेगा. ऐसे में ट्रंप एक ऐसी स्थिति में हैं जहाँ वे न तो युद्ध को और अधिक बढ़ा सकते हैं और न ही बिना किसी ठोस जीत के पीछे हट सकते हैं, क्योंकि पीछे हटने को उनकी कमजोरी माना जाएगा.
वहीं दूसरी ओर, ईरान का मनोबल इस बार अप्रत्याशित रूप से ऊंचा दिखाई दे रहा है. पिछले साल के 12 दिवसीय युद्ध के विपरीत, जहाँ ईरान ने धीमी प्रतिक्रिया दी थी, इस बार तेहरान ने हमले के चंद घंटों के भीतर ही जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी. इराक, कतर, बहरीन और इजरायली शहरों पर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलें इस बात का प्रमाण हैं कि ईरान ने इस हमले का पहले से अनुमान लगा लिया था और उसकी तैयारी पुख्ता थी.
ईरानी सशस्त्र बल एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार दिख रहे हैं, जो अमेरिका के धैर्य की परीक्षा लेगा. ट्रंप का यह सोचना कि ईरानी जनता सड़कों पर उतरकर सरकार का तख्ता पलट देगी, वर्तमान परिस्थितियों में कठिन जान पड़ता है क्योंकि हालिया दमन चक्र के बाद समाज में एक खामोश रेजिलिएंस (लचीलापन) है. अंततः, यदि ईरान ने समर्पण नहीं किया, तो ट्रंप को मजबूरन 'ट्रुथ सोशल' पर अपनी जीत का झूठा दावा कर पीछे हटना पड़ सकता है, लेकिन तब तक ईरान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में और अधिक आक्रामक और शक्तिशाली होकर उभरेगा.