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भारत AI डेटा सेंटर्स की प्यास कैसे बुझाएगा ?

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19 फ़र. 2026, 07:34 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

नल का पानी
नल का पानी

नई दिल्ली । डेस्क: भारत इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर्स के क्षेत्र में एक वैश्विक महाशक्ति बनने की राह पर है, लेकिन इस तकनीकी क्रांति के साथ एक गंभीर पर्यावरणीय संकट भी दस्तक दे रहा है. न्यूटन काउंटी (अमेरिका) और उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा स्थित तुसियाना गांव की भौगोलिक दूरियों के बावजूद, दोनों ही स्थान एक समान समस्या से जूझ रहे हैं, डेटा सेंटर्स द्वारा किया जाने वाला भारी जल उपभोग. 


रिपोर्ट्स के अनुसार, फेसबुक (Meta) के डेटा सेंटर के कारण जहाँ अमेरिका में कुएँ सूख गए, वहीं तुसियाना के ग्रामीणों को अब पानी के लिए 80 फीट गहरा गड्ढा खोदना पड़ रहा है, जबकि दो दशक पहले पानी महज 20-30 फीट पर उपलब्ध था. यह संकट भारत के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, जहाँ उत्तर प्रदेश सरकार ने योटा (Yotta) के साथ 39,000 करोड़ रुपये का समझौता कर छह विशाल डेटा सेंटर बनाने का लक्ष्य रखा है.


भारत की इस 'डेटा भूख' का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश में वर्तमान में 132 डेटा सेंटर्स सक्रिय हैं और 2029 तक 17 शहरों में 84 नई परियोजनाएं प्रस्तावित हैं. 


एरिजटन एडवाइजरी की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र अकेले आगामी क्षमता का 45 प्रतिशत हिस्सा संभाल रहा है, जबकि बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहर प्रमुख हब बनकर उभर रहे हैं. 

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में 'AI इम्पैक्ट समिट' में इन केंद्रों को युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा जरिया बताया है, हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसके विपरीत तर्क देते हैं कि ये केंद्र अत्यधिक स्वचालित होते हैं और पारंपरिक फैक्ट्रियों की तुलना में कम लोगों को रोजगार देते हैं. 


इसी बीच, अडाणी समूह ने 100 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा आधारित AI-रेडी डेटा सेंटर विकसित करने की घोषणा की है, जो भारत की इस दिशा में बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाता है.


हालांकि, तकनीकी प्रगति की इस दौड़ में 'पानी' सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर अभिजीत मुखर्जी और 'सैंड्रप' (SANDRP) के हिमांशु ठक्कर जैसे विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर प्रतिदिन लगभग 11 लाख लीटर से अधिक ताजा पानी गटक जाता है. 


दक्षिण भारतीय शहरों के लिए यह स्थिति और भी भयावह हो सकती है क्योंकि वहां भूजल का स्तर पहले से ही सीमित है. 


मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने आगाह किया है कि पानी की यह बढ़ती मांग कावेरी जैसे अंतर-राज्यीय जल विवादों को और अधिक हिंसक बना सकती है. 


जहाँ एक ओर मोहंदास पाई जैसे दिग्गज मानते हैं कि समस्या पानी की उपलब्धता की नहीं बल्कि उसके प्रबंधन और भंडारण की है, वहीं आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर अर्नब भट्टाचार्य ने रीसायकल किए गए पानी के लिए 'डुल पाइपलाइन' सिस्टम का सुझाव दिया है. 


भारत को अब यह तय करना होगा कि वह डिजिटल भविष्य की इस प्यास को प्राकृतिक संसाधनों की बलि दिए बिना कैसे शांत करता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP