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इतिहास का सबसे बड़ा तेल संकट लेकिन इसका जिम्मेदार कौन?

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25 मार्च 2026, 03:44 AM 6 मिनट में पढ़ें 1

ट्रंप-नेतन्याहू-खामेनेई
ट्रंप-नेतन्याहू-खामेनेई

रायपुर । संवाददाता: दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ आर्थिक प्रगति के पहिये थमते नजर आ रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा तेल संकट घोषित किया है. यह संकट 1973 के उस प्रसिद्ध तेल प्रतिबंध से भी कहीं अधिक गहरा और विनाशकारी है, जिसने कभी पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था को हिला दिया था. आज स्थिति यह है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से दुनिया की 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति ठप हो गई है. लेकिन इस वैश्विक हाहाकार के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इस विनाशकारी स्थिति का असली जिम्मेदार कौन है? क्या यह अमेरिका और इजरायल की आक्रामकता का परिणाम है, या ईरान द्वारा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बंधक बनाना इसका मुख्य कारण है?


हमले की शुरुआत और कूटनीति का अंत:


इस पूरे संकट के मूल में 28 फरवरी की वह तारीख है, जिसने पूरी दुनिया का भूगोल और अर्थशास्त्र बदल दिया. रिकॉर्ड बताते हैं कि जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हवाई हमले शुरू किए, उस वक्त ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के लिए वार्ता का दौर चल रहा था.


कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा थी कि दोनों पक्ष किसी समझौते के करीब पहुंच सकते हैं. लेकिन अचानक हुए सैन्य प्रहारों ने न केवल बातचीत की मेज को उलट दिया, बल्कि ईरान को एक कड़ा सैन्य और आर्थिक कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया. अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि अमेरिका और इजरायल ने 'पहले हमला' (Pre-emptive strike) करने की जो रणनीति अपनाई, उसने आग में घी डालने का काम किया.


वार्ता के दौरान सैन्य कार्रवाई को अक्सर अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक शिष्टाचार के विरुद्ध माना जाता है, और यही वह बिंदु है जहाँ से जिम्मेदारी की उंगली वाशिंगटन और यरूशलेम की ओर उठती है.


ईरान की जवाबी कार्रवाई: मजबूरी या रणनीतिक ब्लैकमेल?


अमेरिकी और इजरायली हमलों के जवाब में ईरान ने दुनिया की दुखती रग यानी 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' पर हाथ रख दिया. ईरान का तर्क है कि जब उस पर चौतरफा हमले हो रहे हैं, तो वह अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. लेकिन यहाँ जिम्मेदारी का दूसरा पक्ष भी है. क्या एक देश को अपनी सुरक्षा के नाम पर पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डालने का हक है? हॉर्मुज से प्रतिदिन 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है.


ईरान ने इस मार्ग को अवरुद्ध करके न केवल अमेरिका को चोट पहुंचाई है, बल्कि उन निर्दोष विकासशील देशों (जैसे वियतनाम, पाकिस्तान और भारत) को भी संकट में डाल दिया है जिनका इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था.


आलोचकों का तर्क है कि ईरान ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को 'ढाल' के रूप में इस्तेमाल किया है, जो उसे इस संकट का एक बड़ा दोषी बनाता है.


1973 बनाम 2026: दोष का बदलता स्वरूप:


अगर हम 1973 के संकट से तुलना करें, तो उस समय सऊदी अरब के नेतृत्व में ओपेक (OPEC) देशों ने तेल को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था. उस वक्त भी कारण इजरायल का समर्थन ही था.


लेकिन 2026 के इस संकट में स्थिति अलग है. यहाँ कोई सामूहिक गुट नहीं है, बल्कि एक त्रिकोणीय संघर्ष है. जहाँ अमेरिका खुद को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर (Net Exporter) बना चुका है, वहीं वह इस युद्ध को शुरू करके वैश्विक तेल कीमतों को $100 के पार ले जाने का जोखिम उठा सका.


अमेरिका के पास रणनीतिक भंडार (SPR) से 17.2 करोड़ बैरल तेल निकालने की क्षमता है, लेकिन गरीब देशों के पास ऐसा कोई सुरक्षा कवच नहीं है. यह विश्लेषण इशारा करता है कि अमेरिका ने यह जानते हुए भी हमला किया कि इसका सबसे बुरा असर उसके मित्र देशों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा.


कौन है असली दोषी? एक तटस्थ विश्लेषण:


दोष निर्धारण की प्रक्रिया में तीन मुख्य पहलू सामने आते हैं. पहला, उकसावा: यदि ईरान वार्ता कर रहा था और उस पर हमला किया गया, तो युद्ध की नैतिक जिम्मेदारी अमेरिका और इजरायल पर आती है.


दूसरा, अनुपातहीन प्रतिक्रिया: यदि ईरान ने अपनी रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग को बंद किया है, जिससे करोड़ों लोग भुखमरी और महंगाई की चपेट में आ रहे हैं, तो मानवीय संकट की जिम्मेदारी ईरान पर है. तीसरा, आर्थिक स्वार्थ: तेल की बढ़ती कीमतों से जहाँ आम आदमी त्रस्त है, वहीं तेल कंपनियों और बड़े निर्यातकों को फायदा हो रहा है.


इतिहास गवाह है कि युद्ध अक्सर उन ताकतों द्वारा थोपे जाते हैं जिन्हें अस्थिरता से लाभ होता है. इस मामले में, शांति की मेज को छोड़कर युद्ध का रास्ता चुनना अमेरिका और इजरायल की एक बड़ी रणनीतिक चूक मानी जा सकती है.


वैश्विक प्रभाव और मंदी की आहट:


इस संकट की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसके दोषी चाहे जो भी हों, इसकी सजा पूरी दुनिया भुगत रही है. ब्रेंट क्रूड के $100 पार होने से परिवहन लागत 50-60% बढ़ गई है. उर्वरकों की कमी के कारण खाद्य सुरक्षा खतरे में है.


अमेरिका में गैस की कीमतें $8 तक पहुंचना और एशिया में पेट्रोल के लिए लंबी कतारें लगना इस बात का सबूत है कि यह युद्ध अब केवल तीन देशों के बीच नहीं रहा. IEA के 400 मिलियन बैरल तेल छोड़ने के फैसले के बावजूद, विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल 'घाव पर पट्टी' लगाने जैसा है, इलाज नहीं. जब तक हॉर्मुज का रास्ता नहीं खुलता, दुनिया 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) के उस दौर में वापस जा रही है जहाँ से निकलना नामुमकिन होगा.


अंततः, इतिहास का यह सबसे बड़ा तेल संकट किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि मानव निर्मित कूटनीतिक विफलता है. जहाँ अमेरिका-इजरायल ने वार्ता के बीच में हमला करके विश्वासघात की नींव रखी, वहीं ईरान ने वैश्विक मार्ग रोककर दुनिया को अपनी जंग में घसीट लिया. 


इस संकट का सबसे बड़ा दोषी वह मानसिकता है जो कूटनीति के ऊपर सैन्य शक्ति को प्राथमिकता देती है. अगर जल्द ही युद्ध विराम नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियां इस दौर को उस समय के रूप में याद रखेंगी जब चंद महाशक्तियों के अहंकार ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को स्वाहा कर दिया था.


यह मुद्दा वाकई जटिल है क्योंकि इसमें एक तरफ सैन्य रणनीति और शक्ति का प्रदर्शन है, तो दूसरी तरफ वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ता सीधा असर. इतिहास गवाह है कि जब भी कूटनीति की मेज पर बंदूकें हावी होती हैं, तो उसकी कीमत उन देशों को चुकानी पड़ती है जिनका उस विवाद से कोई सीधा संबंध नहीं होता.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP