HC: गुड़ के शीरे (मोलासेस) पर राज्य सरकार का नियंत्रण असंवैधानिक
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 'छत्तीसगढ़ मोलासेस (शीरा) नियंत्रण और विनियमन नियम, 2022' को भारत के संविधान के विरुद्ध (अल्ट्रा वायर्स) घोषित करते हुए रद्द कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के पास आबकारी अधिनियम के तहत उन कार्यों के लिए शीरे को विनियमित करने की विधायी शक्ति नहीं है, जिनका उपयोग नशे के लिए नहीं, बल्कि पशु आहार और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है.
अदालत ने मेसर्स केडिया ट्रेडिंग बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के मामले में याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि कोई भी अधीनस्थ कानून अपने मूल अधिनियम (पैरेंट एक्ट) के उद्देश्यों से बाहर नहीं जा सकता.
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 के तहत राज्य केवल 'नशीले पदार्थों' को नियंत्रित कर सकता है, जबकि कच्चा शीरा अपने आप में नशीला नहीं होता है.
याचिकाकर्ताओं, जो मुख्य रूप से पशु आहार और गुड़ाखू के व्यापारी हैं, ने ₹200 प्रति टन शुल्क और अनिवार्य लाइसेंसिंग को चुनौती दी थी.
अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे के तर्कों से सहमति जताई कि शीरा जीएसटी के दायरे में आता है, जो यह साबित करता है कि इसे एक सामान्य वस्तु माना जाता है, न कि शराब की तरह कोई मादक पदार्थ.
कोर्ट ने राज्य सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें शीरे को शराब बनाने का 'आधार' बताकर नियंत्रण की बात कही गई थी. फैसले में जोर दिया गया कि औद्योगिक और कृषि उपयोग आबकारी विभाग के दायरे से बाहर हैं और राज्य सरकार व्यापारियों को गैर-नशीले उपयोग वाले शीरे के लिए आबकारी लाइसेंस लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती.