HC: भरण-पोषण मामले में पत्नी का मौजूदा निवास ही क्षेत्राधिकार का आधार
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण से जुड़े क्षेत्राधिकार पर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने एक डॉक्टर पति की उस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने बिलासपुर फैमिली कोर्ट के क्षेत्राधिकार को चुनौती दी थी. हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि भरण-पोषण के मामलों में पीड़ित पक्ष का मौजूदा निवास स्थान ही सुनवाई का मुख्य आधार होगा.
यह मामला सारंगढ़-बिलाइगढ़ जिले के एक डॉक्टर और उसकी पत्नी के बीच का है. पीड़िता ने अपनी दो नाबालिग बेटियों के साथ बिलासपुर के फैमिली कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण की याचिका दायर की थी.
महिला का आरोप था कि शादी के बाद से ही उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, चरित्र पर झूठे आरोप लगाए गए और आखिरकार बच्चों सहित ससुराल से निकाल दिया गया. कोई स्वतंत्र आय न होने के कारण उसने अपने लिए 1 लाख रुपये और दोनों बेटियों के लिए 20-20 हजार रुपये प्रति माह भरण-पोषण भत्ते की मांग की थी.
इसके उलट, डॉक्टर पति ने बिलासपुर कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया कि शादी सारंगढ़ में हुई थी और पत्नी का मायका भी वहीं है. उसने दावा किया कि पत्नी केवल किराए के मकान का पता दिखाकर बिलासपुर में केस चला रही है, जो कि उसे परेशान करने की नीयत से किया गया है.
पति ने अपनी पोलियो जनित शारीरिक दिव्यांगता का हवाला देते हुए बिलासपुर में चल रही कानूनी कार्यवाही को अमान्य घोषित करने की मांग की थी.
न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पति की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया. हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी ने बिलासपुर में रहने के पुख्ता सबूत पेश किए हैं, जिसमें बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड और रेंट एग्रीमेंट शामिल हैं.
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का स्थायी या पैतृक पता उस अदालत के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित नहीं कर सकता, जहां आवेदक वर्तमान में वास्तव में रह रहा है. अदालत ने जोर देकर कहा कि भरण-पोषण के मामलों में क्षेत्राधिकार के नियम आश्रित पत्नी और बच्चों को न्याय सुलभ कराने के लिए बनाए गए हैं.
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में इस तरह के वैवाहिक विवादों के लिए एक बड़ा नजीर बनेगा. इससे यह साफ हो गया है कि प्रक्रियात्मक और तकनीकी आपत्तियों के आधार पर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को नहीं दबाया जा सकता, और वे अपनी सुविधा व सुरक्षा के अनुसार अपने वर्तमान निवास स्थान से कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं.