हीट वेव को प्राकृतिक आपदा की मान्यता: आम जनता और मजदूरों को फायदा
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में भीषण गर्मी और हीटवेव को लेकर सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. केंद्र सरकार द्वारा हीटवेव को 'अधिसूचित प्राकृतिक आपदा' (Notified Natural Calamity) के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद अब देश भर के राज्यों के लिए इससे निपटने का रास्ता साफ हो गया है.
इस बड़े फैसले का सीधा मतलब यह है कि अब राज्य सरकारें कमजोर और हाशिए पर मौजूद आबादी को बचाने के लिए विशेष वित्तीय सहायता का खुलकर उपयोग कर सकेंगी. खुले में काम करने वाले मजदूरों से लेकर बिजली कटने से परेशान झुग्गी-झोपड़ियों के नागरिकों तक, यह निर्णय गर्मी के प्रकोप से सुरक्षा का एक बड़ा और मजबूत कवच साबित होने की उम्मीद है.
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के विभाग प्रमुख कृष्णा एस. वत्स ने इस संबंध में चर्चा करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में हीटवेव एक गंभीर और लगातार बढ़ने वाला खतरा बन गया है. इसे देखते हुए सरकार का यह दीर्घकालिक और संसाधन-समर्थित कदम बेहद अहम है. इस अधिसूचना के बाद अब राज्य 'राज्य आपदा मोचन निधि' (SDRF) और 'राज्य आपदा न्यूनीकरण निधि' (SDMF) का उपयोग करके आपदा से प्रभावी ढंग से निपट सकेंगे.
पहले स्थानीय स्तर पर इस तरह के खतरे को लेकर राज्यों के हाथ बंधे होते थे और वे इन फंड्स का बहुत सीमित हिस्सा ही इस्तेमाल कर पाते थे, लेकिन अब वह कानूनी और वित्तीय बाधा दूर हो गई है. यह फंड स्थानीय निकायों और शहरी प्रशासन के लिए शुरुआती 'सीड मनी' यानी बीज पूंजी की तरह काम करेगा, जिससे शहरों में हीट एक्शन प्लान (HAP) को तेजी से लागू करने में मदद मिलेगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वित्तीय मदद से नगर निगम और जिला प्रशासन कूलिंग शेल्टर्स के निर्माण, सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल की व्यवस्था और थर्मल कंफर्ट बढ़ाने जैसे ठोस कदम उठा सकेंगे. आने वाले पांच वर्षों में देश भर में स्थानीय स्तर पर ऐसे उपायों में भारी तेजी आने की पूरी संभावना है, जिससे तापमान वृद्धि से जुड़े जलवायु संबंधी कारक को भी बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा.
ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) के संस्थापक-सीईओ अरुणभा घोष ने इस आर्थिक संकट पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हीटवेव केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की उत्पादकता और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला संकट है. भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है जहां बड़ी संख्या में श्रमिक और कार्यबल खुले में काम करते हैं.
इस अधिसूचना के आने से पहले राज्य अपनी निधि का एक बहुत ही छोटा हिस्सा ही हीटवेव प्रबंधन पर खर्च कर पाते थे. अब नियमों के आसान होने से अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों और श्रमिकों को कार्यस्थलों पर बेहतर वेंटिलेशन और सुरक्षा उपाय मिल सकेंगे, जिससे वे अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका सुरक्षित तरीके से निभा पाएंगे.
स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी इस फैसले को गेम-चेंजर माना जा रहा है. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के डॉक्टर हर्षल रमेश साल्वे ने कहा कि इससे गरीब और उच्च जोखिम वाली आबादी को स्वास्थ्य संबंधी वित्तीय संकट से बचाने में मदद मिलेगी. भारत में अक्सर लोग बीमारी के इलाज में अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा जेब से खर्च कर देते हैं, जिसे 'पॉवर्टी-हेल्थ साइकिल' कहा जाता है. सरकारी स्तर पर वित्तीय सुरक्षा और पुनर्वास मिलने से इस चक्र को तोड़ा जा सकेगा.
नैचुरल रिसोर्सेस डिफेंस काउंसिल (NRDC) के भारत में क्लाइमेट रिजिलिएन्स टीम के प्रमुख अभियांति तिवारी ने इस कदम की तुलना कोविड महामारी के दौरान उठाए गए समन्वित कदमों से की है. उन्होंने कहा कि पहले राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय नीतियों के बीच तालमेल की कमी थी, जिसे इस अधिसूचना ने पूरी तरह दूर कर दिया है. अब भारत के पास मजबूत कानूनी और वित्तीय आधार है, जिससे कागजी योजनाओं को जमीन पर उतारना बहुत आसान हो गया है.
अधिकारियों और विशेषज्ञों का मानना है कि अब ध्यान केवल योजनाएं बनाने पर नहीं, बल्कि उन्हें स्थानीय स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने पर केंद्रित होगा.