हसदेव बांगो नहर: अधिग्रहित जमीन के गैर-उपयोग पर पूर्व मालिकों का वापसी का दावा खारिज
हसदेव बांगो नहर परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि की वापसी की मांग करने वाले पूर्व भू-स्वामियों को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है. अदालत ने स्पष्ट किया कि 1894 के अधिनियम के तहत राज्य में निहित हो चुकी जमीन पर गैर-उपयोग के आधार पर वापसी का कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं बनता.
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हसदेव बांगो (मिनीमाता बांगो) नहर परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई भूमि को वापस दिलाने की मांग करने वाली दो जुड़ी हुई याचिकाओं को खारिज कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि अधिग्रहित जमीन का उपयोग न होना पूर्व भू-स्वामियों को उसे वापस पाने या पुनः हस्तांतरण की मांग करने का कोई कानूनी या प्रवर्तनीय अधिकार नहीं देता है.
न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने 5 नवंबर को यह संयुक्त आदेश पारित किया. अदालत ने टिप्पणी की, "अधिग्रहित भूमि का महज उपयोग न होना पूर्व भू-स्वामियों को उसे वापस पाने का अधिकार प्रदान नहीं करता है, विशेषकर तब जब 1894 के अधिनियम के तहत जमीन पूरी तरह से राज्य में निहित हो चुकी है और मूल या संबद्ध सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए उसकी आवश्यकता बनी हुई है."
यह मामला रायगढ़ जिले के खरसिया क्षेत्र के एक परिवार के सदस्यों द्वारा दायर किया गया था, जिनकी कृषि भूमि गांव में स्थित थी. इसमें 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत अधिग्रहित 0.598 हेक्टेयर और 0.356 हेक्टेयर भूमि शामिल थी, जिसका अधिग्रहण 28 फरवरी 2004 को अवार्ड जारी होने के साथ पूरा हुआ था.
याचिकाकर्ताओं ने रायगढ़ कलेक्टर के 27 सितंबर 2021 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत अप्रयुक्त हिस्से की वापसी के आवेदनों को खारिज कर दिया गया था.
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नहर का निर्माण एक दशक से भी पहले पूरा हो चुका है और सीमांकन तथा जांच रिपोर्ट से पता चलता है कि जमीन का एक बड़ा हिस्सा अप्रभावित रहा.
उन्होंने 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' की धारा 101 का हवाला दिया, जिसमें 5 वर्षों तक अप्रयुक्त रहने वाली भूमि को वापस लौटाने का प्रावधान है.
दूसरी ओर, सरकारी वकील ने तर्क दिया कि भूमि पूरी तरह से राज्य सरकार के अधीन आ चुकी है और 1894 के अधिनियम में 2013 के कानून की धारा 101 जैसा कोई प्रावधान नहीं था. नहर से वर्ष 2005-06 से सिंचाई प्रदान की जा रही है और उसके किनारों की भूमि का उपयोग निरीक्षण, रखरखाव और पर्यवेक्षण के लिए आवश्यक है.
15 जून 2026 को अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों के बाद, कार्यपालन अभियंता और कलेक्टर ने हलफनामा प्रस्तुत कर सूचित किया कि दोनों तटों पर खुली जगह निरीक्षण मार्ग और रखरखाव के लिए आवश्यक है. इसके अलावा शेष हिस्से को संभावित झोपड़ियों, स्टोररूम और साइट कार्यालयों के लिए चिह्नित किया गया है.
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने न तो मूल अधिग्रहण की कार्रवाई को चुनौती दी थी और न ही 2004 के अवार्ड को. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि 2013 के अधिनियम की धारा 101 केवल उसी कानून के तहत हुए अधिग्रहणों पर लागू होती है, 1894 के अधिनियम के मामलों में नहीं.
अदालत ने कहा कि एक नहर परियोजना को केवल चैनल द्वारा भौतिक रूप से घेरी गई जमीन से अधिक स्थान की आवश्यकता होती है और किसी ढांचे का न होना जमीन को 'अधिशेष' (सरप्लस) नहीं बनाता.
राज्य के फैसले में न्यायिक समीक्षा केवल यह जांचने तक सीमित है कि निर्णय दुर्भावनापूर्ण, मनमाना या शक्तियों का दुरुपयोग तो नहीं है. कलेक्टर के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार न पाते हुए अदालत ने दोनों याचिकाओं को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया.