रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

ईरान-इजरायल युद्ध की आग में झुलसी खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था

C

CG Khabar

13 मार्च 2026, 01:36 AM 4 मिनट में पढ़ें 1

IRGC
IRGC

नई दिल्ली । डेस्क: खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों ने पिछले कई दशकों में अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त कर एक वैश्विक हब बनाने के लिए खरबों डॉलर का निवेश किया था, लेकिन आज वे निवेश और सपने एक भीषण युद्ध की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं. वर्तमान में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध और उसके जवाब में ईरान की आक्रामक जवाबी कार्रवाई ने खाड़ी देशों को एक ऐसे भू-राजनीतिक भंवर में फंसा दिया है, जिसके वे पक्षकार भी नहीं थे. 


जानकारों का कहना है कि खाड़ी देश इस समय 'हथौड़े और निहाई' के बीच फंसे हुए हैं, जहां एक ओर वैश्विक शक्तियों का सैन्य टकराव है और दूसरी ओर उनकी अपनी भौगोलिक स्थिति. 

विज्ञापन


कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान बिन जासिम अल थानी ने ईरान के हमलों को एक 'विश्वासघात' करार दिया है, क्योंकि खाड़ी देशों ने युद्ध को रोकने के लिए व्यापक कूटनीतिक प्रयास किए थे, जिन्हें 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के कड़े रुख ने विफल कर दिया. 


इस संघर्ष का सबसे भयावह आर्थिक प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के रूप में सामने आया है. यह जलमार्ग दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है, लेकिन अब यहाँ से होने वाला निर्यात अपने सामान्य स्तर से गिरकर 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है.


इस नाकाबंदी ने इराक जैसे देशों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है, जिसके पास केवल छह दिनों की तेल भंडारण क्षमता है. भंडारण भर जाने के कारण इराक को अपना उत्पादन 33 लाख बैरल प्रति दिन से घटाकर 13 लाख बैरल करना पड़ा है. 


सऊदी अरब अपनी पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन के माध्यम से कुछ हद तक वैकल्पिक मार्ग का उपयोग कर पा रहा है, लेकिन कुवैत और कतर जैसे देशों को अपने वैश्विक ऊर्जा अनुबंधों को बचाने के लिए 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) घोषित करने पर मजबूर होना पड़ा है. 


ऊर्जा के साथ-साथ नागरिक बुनियादी ढांचे पर भी हमले तेज हुए हैं. 


कतर में ईरानी हमलों का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा केंद्रों के अलावा पेयजल जलाशयों और नागरिक ठिकानों को निशाना बना रहा है, जो ईरान के उस दावे पर सवाल उठाता है कि वह केवल सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है. 


इस युद्ध ने खाड़ी के पर्यटन और विमानन क्षेत्र की कमर भी तोड़ दी है. दोहा, अबू धाबी और दुबई जैसे वैश्विक ट्रांजिट हब से होने वाली लगभग 40,000 उड़ानें रद्द हो चुकी हैं, जिससे यह क्षेत्र शेष दुनिया से कट गया है.


आर्थिक नुकसान के अलावा रक्षा पर होने वाला खर्च भी खाड़ी देशों की तिजोरी खाली कर रहा है. यहाँ एक चौंकाने वाली आर्थिक असमानता देखी जा रही है. जहाँ ईरान अपने हमलों के लिए 20,000 से 50,000 डॉलर की लागत वाले सस्ते 'शाहिद' ड्रोनों का उपयोग कर रहा है, वहीं खाड़ी देशों को उन्हें रोकने के लिए 30 लाख से 50 लाख डॉलर प्रति यूनिट वाले 'पैट्रियट पीएसी-3' इंटरसेप्टर दागने पड़ रहे हैं. 


अकेले संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी हवाई सुरक्षा पर करीब 2.61 अरब डॉलर खर्च किए हैं, जो ईरान द्वारा किए गए हमलों की लागत से 13 गुना अधिक है. 


कुवैत और कतर भी अरबों डॉलर केवल रक्षा प्रणाली को बनाए रखने में गंवा रहे हैं. इस संकट का असर केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक है. 


खाड़ी क्षेत्र से होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक और यूरिया का निर्यात ठप होने से वैश्विक खाद्य संकट की आहट सुनाई दे रही है.


 मिस्र जैसे देशों में यूरिया की कीमतें रातों-रात 37 प्रतिशत बढ़ गई हैं, जिससे आने वाले समय में विकासशील देशों में अनाज की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका है. 


अंततः, यह युद्ध खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा रणनीतियों और अमेरिका के साथ अपने ऐतिहासिक सुरक्षा समझौतों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है, क्योंकि वे अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण उस युद्ध की भारी कीमत चुका रहे हैं जिसे उन्होंने कभी शुरू ही नहीं किया थाद

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP