ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत पिछड़ा
नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी जरूरी
नई दिल्ली । डेस्क: ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार भारत में राजनीतिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2025 में 14.7 फीसदी से घटकर 13.8 फीसदी हो गया, जो लगातार दूसरे वर्ष 2023 के स्तर से नीचे है. इसके अलावा, मंत्रिस्तरीय भूमिकाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी भी 6.5 फीसदी से घटकर फीसदी हो गई, जो 2023 से चली आ रही गिरावट को दर्शाता है.
विश्व आर्थिक मंच की हालिया वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक (Global Gender Gap Index) रिपोर्ट के अनुसार, भारत की स्थिति पिछले वर्ष की तुलना में दो अंक नीचे खिसककर 148 देशों में 131वें स्थान पर आ गई है.
भारत का लैंगिक समानता स्कोर मात्र 64.1 फीसदी है, जिसके कारण यह दक्षिण एशिया के सबसे निचले पायदान पर मौजूद देशों में शामिल है. यह सूचकांक चार प्रमुख क्षेत्रों में लैंगिक समानता को नापता है: आर्थिक भागीदारी और अवसर, शैक्षिक उपलब्धि, स्वास्थ्य और जीवन रक्षा, और राजनीतिक सशक्तिकरण.
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने आर्थिक भागीदारी और अवसर के क्षेत्र में 0.9 प्रतिशत अंकों की मामूली प्रगति की है. अनुमानित आय में लैंगिक समानता 28.6 फीसदी से बढ़कर 29.9 फीसदी हो गई है, जिसने इस उप-सूचकांक के स्कोर को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. श्रम बल भागीदारी दर 45.9 फीसदी पर स्थिर रही, जो भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. शैक्षिक उपलब्धि और स्वास्थ्य व जीवन रक्षा के क्षेत्रों में भी सकारात्मक बदलाव देखे गये हैं.
भारत के लिए अब रास्ता स्पष्ट है प्राप्त उपलब्धियों को मजबूत करना और कमियों को दूर करने के लिए ठोस नीतियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता. भारत में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का मुद्दा लंबे समय से विवादों में रहा है. 1996 में पहली बार पेश किया गया महिला आरक्षण विधेयक 27 साल बाद 2023 में पारित हुआ. इस विधेयक को कई बाधाओं और विरोधों का सामना करना पड़ा.
वर्तमान कानून संसद और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित करता है, लेकिन यह 2029 से पहले लागू नहीं होगा, क्योंकि इसके लिये जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया पूरी होनी बाकी है.
हालांकि, वैश्विक सूचकांक में भारत की रैंकिंग में सुधार से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि देश में एक संतुलित और प्रशंसनीय लैंगिक समानता संरचना स्थापित की जाये. राजनीतिक दलों के लिये कोई बाध्यता नहीं है कि वे इस कानून के लागू होने से पहले ही महिलाओं की चुनावी भागीदारी को बढ़ायें. यह एक ऐसा अवसर है, जिसे अपनाकर भारत लैंगिक समानता की दिशा में ठोस कदम उठा सकता है.