खाद्य सुरक्षा होनी चाहिए पहली प्राथमिकता
देविंदर शर्मा
प्रोफेसर एम. एस. स्वामीनाथन ने कभी लिखा था: "अगर कृषि विफल होती है, तो इस देश में कुछ भी सही नहीं हो सकता." ये शब्द आज भी गूंजते हैं कृषि को रीढ़ मानते हुए, हरित क्रांति के जनक ने यह संकेत दिया था कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है-और वह भी बिना पर्यावरणीय क्षति के.
खाद्य सुरक्षा का महत्व तब तक सामने नहीं आता, जब तक युद्ध के बादल न मंडराने लगें. जब दो पड़ोसी देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो भारत की आत्मविश्वास से भरी प्रतिक्रिया, जो हवाई हमलों का जवाब दे रही है, उसकी एक बड़ी वजह देश के भीतर संतोषजनक खाद्य स्थिति है. 2024-25 के विपणन सीजन में रिकॉर्ड फसल उत्पादन और आगामी अच्छे मानसून की भविष्यवाणी के चलते भारत को खाद्य सुरक्षा को लेकर कोई चिंता नहीं है.
लेकिन पाकिस्तान की स्थिति ऐसी नहीं है. घरेलू खाद्य उपलब्धता में भारी कमी की आशंका है, जो नीति की खामियों, जलवायु में असामान्य बदलाव और आर्थिक बाधाओं का परिणाम है. रिपोर्टों के अनुसार, जहां कुछ साल पहले गेहूं की कीमत PKR 70 प्रति किलोग्राम थी, वहीं अब यह बढ़कर PKR 400 से 450 प्रति किलोग्राम हो गई है. सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच, तीन से पाँच मिलियन टन गेहूं आयात करने की योजना बना रही पाकिस्तान की नीति-निर्माता जमात की चिंता बढ़ रही है. युद्ध की संभावित लागत को देखते हुए, जो आर्थिक संसाधनों पर बहुत भारी पड़ती है, एक असंतोषजनक आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना एक दोहरा संकट है.
राजा मुनीब ने 9 अप्रैल 2025 को First Post में एक बेहद स्पष्ट लेख में लिखा: "2021 से 2024 के बीच पाकिस्तान में खुदरा गेहूं कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जो देश की कृषि आपूर्ति श्रृंखला और व्यापक आर्थिक दबावों में गहराई से समाई अस्थिरता को दर्शाता है. 2021 में गेहूं लगभग PKR 70 प्रति किलोग्राम था. 2022 में यह तेजी से बढ़कर PKR 100 हो गया - यानी 30 प्रतिशत की वृद्धि. 2023 में यह और भी तेजी से बढ़कर PKR 170 हो गया - एक वर्ष में 70 प्रतिशत की वृद्धि. लेकिन 2024 में खुदरा मूल्य में सबसे नाटकीय उछाल आया - PKR 400 से 450 प्रति किलोग्राम, यानी 135 प्रतिशत की जबरदस्त छलांग. इस चार साल की मूल्य-वृद्धि ने घरेलू बजट पर गहरा असर डाला, जिससे गेहूं, जो कि मुख्य खाद्य पदार्थ है, लाखों पाकिस्तानी नागरिकों की पहुंच से बाहर हो गया और राष्ट्रीय खाद्य असुरक्षा को और बढ़ा दिया."
इसके परिणामस्वरूप, पाकिस्तान ने 2024 के मध्य में कई स्थानों पर खाद्य दंगे देखे. रूस-यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न आपूर्ति संकट ने इस अव्यवस्था को और बढ़ा दिया. बात जब यूक्रेन की हो रही है, तो यह युद्ध यह भी दिखाता है कि मध्य एशियाई अर्थव्यवस्था हथियारों पर कितनी निर्भर हो गई है. लेकिन घरेलू खाद्य स्थिति मजबूत होने से यूक्रेन को कम से कम भोजन के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ी. यूक्रेन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मक्का निर्यातक, पांचवां सबसे बड़ा गेहूं और जौ निर्यातक, और सोयाबीन तेल का सबसे बड़ा निर्यातक है.
रूस ने 2022 में यूक्रेन के 22 प्रतिशत कृषि भूमि पर नियंत्रण पा लिया था. किसी भी युद्धविराम की स्थिति में, यह ज़मीन रूस के हिस्से में जाएगी, और यह दिखाता है कि खेतों पर नियंत्रण का युद्ध कितना महत्त्वपूर्ण है. 2024 में रूस के कृषि निर्यात में अफ्रीका की दिशा में 19 प्रतिशत की मूल्यवृद्धि हुई. रूस अगले कुछ वर्षों में अपने कृषि निर्यात को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने और उर्वरक उत्पादन में एक-तिहाई की वृद्धि करने की योजना बना रहा है.
हालांकि युद्ध की शुरुआत में वैश्विक खाद्य कीमतों में वृद्धि हुई थी, बाद में कीमतों में गिरावट आई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि युद्ध की आड़ में सट्टेबाजों ने जमकर मुनाफा कमाया. यही स्थिति पाकिस्तान में 2024 में देखी गई, जब निजी व्यापारी और जमाखोरों ने बड़े पैमाने पर अनाज का भंडारण किया, जिससे संकट और गहराया. यह काम बाजारों पर नहीं छोड़ा जा सकता. वैश्विक प्रयास होना चाहिए कि सरकारें हस्तक्षेप करें और कीमतों को नियंत्रण में रखें. सिर्फ मांग-आपूर्ति के सिद्धांत पर चलकर किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए न्यायसंगत और सुलभ मूल्य नहीं सुनिश्चित किए जा सकते.
यही प्रोफेसर स्वामीनाथन के 2002 में कहे गए वाक्य का महत्व दर्शाता है. संदेश बिल्कुल स्पष्ट है- कृषि का आर्थिक महत्व कायम है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे मिली उपलब्धियां व्यर्थ न जाएं. भारत (और पाकिस्तान जैसे देशों) में छोटे किसानों की आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करना ज़रूरी है. और किसानों को मजबूर करना कि वे शहरों की ओर पलायन करें और छोटे-मोटे कामों में लग जाएं, यह सोच अब पुरानी हो चुकी है और इसका विरोध किया जाना चाहिए.
किसी भी देश के लिए घरेलू खाद्य सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. इसका मतलब है- घरेलू खाद्य उत्पादन को उन शर्तों के चलते तबाह नहीं किया जाना चाहिए जो IMF या वर्ल्ड बैंक अपने बेलआउट पैकेज के साथ थोपते हैं. प्रसिद्ध फिल्म निर्माता माइकल मूर ने अपनी किताब ‘The Stupid White Men’ में लिखा है कि हर बेलआउट पैकेज के साथ करीब 140 से 150 शर्तें जुड़ी होती हैं. इनमें से एक शर्त यह होती है कि किसानों को मिलने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी को समाप्त किया जाए.
मैं राजा मुनीब की बात से सहमत हूं जब उन्होंने लिखा:"MSP नीति को खत्म करना पाकिस्तान की कृषि और खाद्य प्रणाली में एक खतरनाक श्रृंखला प्रतिक्रिया को जन्म देता है. सबसे पहले इसकी मार छोटे किसानों पर पड़ती है, जो गारंटीशुदा न्यूनतम मूल्य के अभाव में बिचौलियों और निजी व्यापारियों के शोषण का शिकार हो जाते हैं. ये व्यापारी अक्सर मिलकर कीमतें दबाते हैं, जिससे किसानों को नुकसान में अपना गेहूं बेचना पड़ता है ताकि वे कर्ज चुका सकें और अगली फसल के लिए बुआई कर सकें. सरकार के पीछे हटने से जो खाली स्थान बनता है, उसे निजी क्षेत्र भरता है- लेकिन यह जनता के हित में नहीं होता. जमाखोर और सट्टेबाज बड़ी मात्रा में फसल खरीद कर रख लेते हैं और जब कीमतें बढ़ती हैं तो बेचते हैं, जिससे नकली संकट उत्पन्न होता है और महंगाई बढ़ती है."
IMF ने पाकिस्तान को गेहूं के MSP से हटने के लिए मजबूर किया, लेकिन पाकिस्तान को यह दोहरा खेल नहीं खेलना चाहिए कि WTO में अमीर देशों के साथ मिलकर भारत से ‘पीस क्लॉज’ को हटाने की मांग करे, जो भारत को खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज का भंडारण करने की छूट देता है. अगर पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया होता, तो वह स्वयं MSP के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कर सकता था. चाहे वह इंकार करे, लेकिन पाकिस्तान को अब यह समझना होगा कि प्रोफेसर स्वामीनाथन की बात कितनी अहम थी.