बस्तर के जंगलों में आग: शिकार के लिए फूंकी जा रही बैलाडीला की पहाड़ियां
जगदलपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित बैलाडीला की पहाड़ियों सहित बस्तर के विशाल वन क्षेत्र पिछले एक सप्ताह से भीषण आग की चपेट में हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि यह आग प्राकृतिक नहीं, बल्कि शिकार के लिए जानबूझकर लगाई जा रही है.
माओवादी गतिविधियों में कमी आने के बाद इन दुर्गम क्षेत्रों में मानवीय दखल बढ़ा है, जिसका फायदा उठाकर शिकारी पारंपरिक 'पाराद' उत्सव की आड़ में वन्यजीवों का सफाया कर रहे हैं.
ड्रोन फुटेज में पहाड़ियों के ढलानों पर धुआं और जलते हुए जंगल साफ देखे जा सकते हैं, जिससे न केवल बेशकीमती वन संपदा खाक हो रही है, बल्कि हिरण, चीतल, जंगली सूअर और दुर्लभ पक्षियों का अस्तित्व भी संकट में है.
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, ग्रामीण वन्यजीवों को घेरने और उन्हें पानी के स्रोतों की ओर खदेड़ने के लिए जंगल के हिस्सों में आग लगा देते हैं, जिससे भागते हुए जानवर आसानी से जाल में फंस जाते हैं. हालांकि 'पाराद' एक प्राचीन जनजातीय परंपरा है, लेकिन अब इसके व्यावसायिक इस्तेमाल और खालों की तस्करी की खबरें चिंता बढ़ा रही हैं.
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अरुण कुमार पांडे ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और पुलिस के साथ संयुक्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. वन्यजीव विशेषज्ञ नितिन सिंघवी ने चेतावनी दी है कि माओवादियों के पीछे हटने से पैदा हुए शून्य का उपयोग अब शिकारी कर रहे हैं.
उन्होंने शासन से मांग की है कि फील्ड स्टाफ की सुरक्षा और शिकार रोकने के लिए दंतेवाड़ा में तैनात डीआरजी (DRG) जवानों को वन विभाग की टीमों के साथ तैनात किया जाए.