शनि, 17 अक्टू. 2026

CGKhabar

झीरम हमले के 12 साल बाद भी अनसुलझी गुत्थी

छत्तीसगढ़ के बस्तर की दरभा झीरम घाटी में मारे गये कांग्रेसी नेताओं के 12 साल

C

CG Khabar

25 मई 2025, 11:08 AM 5 मिनट में पढ़ें 1

झीरम घाटी हमला
झीरम घाटी हमला

जगदलपुर | संवाददाताः छत्तीसगढ़ के बस्तर की दरभा झीरम घाटी में 25 मई 2013 को हुए देश के सबसे बड़े माओवादी हमले को आज 12 साल बीत चुके हैं. इस हमले में तत्कालीन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा समेत 27 कांग्रेसी नेताओं और 4 जवानों की शहादत हुई थी.


रविवार को इस घटना की 12वीं बरसी के मौके पर पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज समेत सभी कांग्रेसियों ने जगदलपुर के लालबाग में बने झीरम घाटी शहीद स्मारक और झीरम घाटी घटनास्थल में बने शहीद स्मारक में पहुँच शहीदों को श्रद्धांजलि दी.


पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि इस घटना को 12 साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक इस घटना में मारे गए कांग्रेसियों और जवानों के परिवार वालों को न्याय नहीं मिल सका है.


आज तक इस घटना का राज नहीं खुला. इस घटना की सच्चाई जानने के लिए दोनो सरकारों ने 5 से भी ज्यादा न्यायिक जांच दल गठित किये, लेकिन यह सभी जांच राजनीतिक षड्यंत्र की भेट चढ़ गईं.


कोई भी जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी.


पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज ने आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा सरकार इस घटना की सच्चाई सामने नहीं आने देना चाहती.


इसीलिए कांग्रेस सरकार में गठित की गई एसआईटी जांच पर तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष धर्मलाल कौशिक ने हाईकोर्ट में याचिका दायक कर एसआईटी जांच में स्टे लगा दिया, ताकि इस घटना की सच्चाई सामने नहीं आ सके.


वारदात के दिन कांग्रेस के काफिले को सुरक्षा नहीं देना, रोड ओपनिंग पार्टी नहीं लगाना, इस बात का सबूत है कि झीरम घाटी की घटना राजनीतिक षड्यंत्र की भेंट चढ़ गई और आज तक इस घटना में मारे गए कांग्रेसी नेताओ और जवानों को न्याय नहीं मिल सका है.


12 साल बाद भी जांच अधूरी

बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार करीमुद्दीन का कहना है कि झीरम घाटी में हुए इस नक्सली वारदात के 12 साल बीत जाने के बाद भी यह पूरा मामला राजनीतिक षड्यंत्र और हत्या के पीछे की वजहों को तलाशते गुजर गया.


इन मुद्दों पर सही नतीजे को लेकर प्रयास कम ही हुए लेकिन पूरे मामले को लेकर सियासत सबसे ज्यादा हुई.


सियासत के नफे नुकसान के बीच सच्चाई पता लगाने की कोशिशों में कुछ इंच का भी इजाफा नहीं हुआ. हमले के पीछे कौन, क्या यह सिर्फ नक्सली हमला था या फिर सुनियोजित षड्यंत्र ,नक्सलियों को इस हमले से क्या हासिल हुआ.


आखिर कांग्रेस के नेता ही क्यों टारगेट किए गए, इसको लेकर अब तक सार्थक जवाब जनता के सामने नहीं आ पाया है.


अब भी सियासी बयानबाजी का दौर थमा नहीं है. आरोप - प्रत्यारोप ऐसे कि मानो किसी को मौका मिल जाता तो वह तुरंत ही सभी सवालों के हल निकाल देता जबकि दोनों ही सरकारों को बराबर घटना के बाद आम जनता ने मौका दिया.


लेकिन दोनों ही राजनीतिक दलों की तरफ से अब तक कोई ठोस साक्ष्य नहीं रखे जा सके हैं.


झीरम हमले में घायलों को न्याय की उम्मीद

झीरम घाटी हमले में घायल हुए मलकीत सिंह गैदु, राजीव नारंग, चंद्रभान झाड़ी, वाहन चालक अब्दुल का कहना है कि इस घटना को याद कर आज भी उनकी रूह कांप जाती है.


उनके सामने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी गई.


विडंबना वाली बात यह है कि घटना के 12 साल बीत चुके हैं लेकिन अब तक इस झीरम घाटी हमले का राज नहीं खुल सका है.


ये घटना राजनीतिक षड्यंत्र है या कुछ और, यह भी पता नहीं लगाया जा सका है. हालांकि आज नहीं तो कल उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद जरूर है.


हमले में शामिल कई माओवादी मुठभेड़ में मारे गए

इस मामले में बस्तर एसपी सलभ सिन्हा का कहना है कि झीरम घाटी हमले में शामिल कई माओवादी सरेंडर कर चुके हैं.


वहीं कई माओवादियों को अलग-अलग मुठभेड़ में मार गिराया गया है. वहीं कई माओवादी गिरफ्तार भी हुए हैं. गिरफ्तार माओवादियों ने इस घटना के बारे में कई जानकारी भी दी, जिसे एसआईटी की जांच में दर्ज भी किया गया.


वहीं झीरम घाटी हमले में शामिल कई बड़े माओवादी लीडर मुठभेड़ में मारे गए हैं.


कांग्रेस भाजपा पर लगाती आ रही सुपारी किलिंग का आरोप 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हुआ माओवादी हमला देश के इतिहास में काले धब्बे की तरह हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है. उसके साथ ही इस घटना के पीछे के कई सवाल अब तक अनसुलझे हैं.


कांग्रेस नेताओं की घटना के दौरान मौत के बाद से लगातार कांग्रेस इस पूरे हमले को एक सुपारी किलिंग का मामला बताती रही है.


जो कांग्रेस नेता इस हादसे में बच निकले थे, उन्होंने यह साफ किया कि पूरे हमले के दौरान चुनिंदा नेताओं की पहचान कर उनकी हत्या की गई.


जबकि बाकी बहुत से लोगों को छोड़ दिया गया. मतलब हमले के पीछे सोची समझी रणनीति और सुपारी किलिंग का अंदाजा लगता है.


विपक्ष में रहने के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने मजबूत साक्ष्य की मौजूदगी की बात कही, लेकिन उन्हें कभी सार्वजनिक नहीं किया.


साल 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी पर सरकार के पूरे कार्यकाल में एनआईए और एसआईटी से कानूनी लड़ाई के दावों के बीच समय बीत गया.


उन साक्ष्य को जनता के सामने भी नहीं रखा गया जो इस सुपारी किलिंग की पुष्टि करते हों. फिलहाल इस घटना को लेकर समय बीतता जा रहा है और हर साल झीरम घाटी में शहीदों को श्रद्धांजलि दी जा रही है.


लेकिन आखिर कब घटना में शहीद हुए परिवारों को न्याय मिल पाएगा, इसको लेकर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP