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चुनावी 'रेवड़ी': राज्यों पर भारी पड़ रहा मुफ्त अनुदान का बोझ

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15 नव. 2025, 01:44 AM 4 मिनट में पढ़ें 2

महिला वोटर
महिला वोटर

नई दिल्ली । डेस्क: देश की राजनीति में इन दिनों 'अनुदान की राजनीति' छाई हुई है. पश्चिम बंगाल में 'लक्ष्मी भंडार' हो, बिहार में 'महिला रोजगार योजना', या ओडिशा की 'सुभद्रा योजना' नकद राशि सीधे महिलाओं के खाते में डालने की ये योजनाएं हर जगह सुपरहिट साबित हो रही हैं.


कर्नाटक में इसे 'गृहलक्ष्मी' कहते हैं, मध्य प्रदेश में 'लाडली बहना', और महाराष्ट्र में इसका नाम 'लाड की बहिन' है. नाम भले ही अलग हों, लेकिन इन सबका मकसद एक है महिलाओं को नकद आर्थिक मदद देकर उन्हें सशक्त बनाना.

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GDP का 0.5% हिस्सा सिर्फ अनुदान पर खर्च


वर्तमान में देश के कुल 12 राज्यों में महिलाओं को वित्तीय सहायता देने की सरकारी योजनाएं चल रही हैं. हर चुनाव से पहले इन अनुदानों की राशि बढ़ाई जा रही है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था और विकास परियोजनाओं के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है.


एक हालिया सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि इन 12 राज्यों में केवल इन नकद अनुदानों पर सालाना 1,68,050 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं. यह राशि पूरे देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 0.5% है. ध्यान देने योग्य बात यह है कि केवल दो साल पहले, इस मद में खर्च होने वाली राशि देश की जीडीपी का 0.2% थी, यानी इसमें दोगुनी से अधिक की वृद्धि हुई है.


चुनावी दांवपेंच और राजनीतिक बयानबाजी


महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए पक्ष और विपक्ष, भाजपा और गैर-भाजपा दल, सभी एक ही रास्ते पर चल रहे हैं.


हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि, "बिहार का परिणाम निराशाजनक है, इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन, चुनाव प्रचार के दौरान भी महिलाओं को 10,000 रुपये दिए गए. चुनाव आयोग सब कुछ देखकर भी मूकदर्शक बना रहा." वहीं, महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने भी वादा किया था कि चुनाव जीतने पर हर महिला को सालाना 30,000 रुपये मिलेंगे.


हालांकि, राज्यों में सत्ताधारी दलों के लिए इस तरह के अनुदान देना आसान होता है, और बिहार में महिलाओं ने नीतीश कुमार की योजना पर ज़्यादा भरोसा दिखाया, क्योंकि उन्हें पैसा चुनाव से पहले मिल गया था.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नकद पैसा देने वाली योजनाओं को गैर-भाजपा सरकारों की 'रेवड़ी (मिठाई) राजनीति' कहकर अक्सर कटाक्ष करते रहे हैं. लेकिन बिहार चुनाव से ठीक पहले दिल्ली से उन्होंने भी 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' की शुरुआत की. उन्होंने घोषणा की थी कि जो महिलाएं व्यवसाय करके आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं, उन्हें एकमुश्त 10,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी, और खातों में पैसा भेजना शुरू भी हो चुका है.


राज्यों पर बढ़ता कर्ज और विकास परियोजनाओं की अनदेखी


मासिक रूप से 1,000 या 2,000 रुपये मिलने से ग्रामीण भारत की अविवाहित महिलाओं, विवाहित महिलाओं या प्रौढ़ाओं को घर-परिवार के लिए कुछ खर्च करने की आजादी मिलती है, जो कम महत्वपूर्ण नहीं है.


लेकिन इस दान-खैरात के चलते सरकार के पीछे ऋण का बोझ लगातार भारी होता जा रहा है.


आंकड़ों के मुताबिक, असम सरकार ने महिला अनुदान पर अपना खर्च 31% बढ़ा दिया है.


पश्चिम बंगाल भी पीछे नहीं है, उसने चालू वित्त वर्ष में महिलाओं के लिए वित्तीय अनुदान में 15% की वृद्धि की है.


झारखंड सरकार ने अक्टूबर से अपनी 'मुख्यमंत्री मैया सम्मान' योजना में वित्तीय अनुदान 1,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये कर दिया है.


वहीं, महाराष्ट्र सरकार की तरह खर्च कम करने के उदाहरण भी मौजूद हैं, जिसने किसानों के लिए एक नई योजना लाने के बाद अपनी 'लाड की बहिन' योजना में मासिक आवंटन 1,500 रुपये से घटाकर 500 रुपये कर दिया है, क्योंकि सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ गया था.


आरबीआई की चेतावनी और आर्थिक दुष्प्रभाव


सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सचमुच अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है? शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी ढाँचों पर आवंटन बढ़ाने से देश का सर्वांगीण विकास तेज़ी से हो सकता था. लेकिन अनुदान के दबाव में ये महत्वपूर्ण कार्य बाधित हो रहे हैं.


रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने पहले ही कई राज्यों को सब्सिडी, कृषि ऋण माफी, और नकद हस्तांतरण पर बढ़ते खर्च के बारे में सख्त चेतावनी दी है. विभिन्न सर्वे संकेत दे रहे हैं कि जिन छह राज्यों में मतदाताओं को नकद वित्तीय अनुदान दिया जा रहा है, वहाँ वित्त वर्ष 2025-26 तक राजस्व घाटा एक गंभीर स्तर पर पहुँच जाएगा.


अनुदान की यह 'दवा' बेशक तुरंत राजनीतिक लाभ देती है, लेकिन इसका 'साइड इफेक्ट' यानी आर्थिक दुष्प्रभाव होना तय है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP