गाजा में पाक सैनिकों की तैनाती को मिला जनसमर्थन
इस्लामाबाद । डेस्क: गैलप पाकिस्तान द्वारा जारी किए गए एक सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि लगभग तीन-चौथाई पाकिस्तानी नागरिक गाजा पट्टी में एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (आईएसएफ) के हिस्से के रूप में अपने सैनिकों को तैनात करने के पक्ष में हैं. यह सर्वे ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के 19 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' की पहली औपचारिक बैठक में शामिल होने की खबरें गर्म हैं. पाकिस्तान पिछले महीने ही कई अन्य मुस्लिम देशों के साथ इस बोर्ड का हिस्सा बना है.
15 जनवरी से 3 फरवरी के बीच 1,600 लोगों पर किए गए इस टेलीफोनिक सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई है कि पाकिस्तानी जनता फलस्तीनी मुद्दे से गहराई से जुड़ी हुई है, हालांकि रणनीतिक बारीकियों पर समाज में वैचारिक मतभेद भी मौजूद हैं. सर्वेक्षण के अनुसार 73 प्रतिशत लोग सेना भेजने का समर्थन कर रहे हैं, जिसमें 55 प्रतिशत ने 'मजबूत' और 18 प्रतिशत ने 'हल्का' समर्थन जताया है. इसके विपरीत, केवल 6 प्रतिशत लोगों ने इस विचार का विरोध किया, जबकि 16 प्रतिशत अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाए हैं.
गैलप पाकिस्तान के कार्यकारी निदेशक बिलाल गिलानी का मानना है कि यह डेटा देश के एलीट और आम जनता के बीच एक दिलचस्प विरोधाभास को दर्शाता है. जहां विशिष्ट वर्ग बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने को लेकर थोड़ा हिचकिचा रहा है, वहीं आम जनता सेना भेजने के मुद्दे पर अधिक एकजुट दिखती है. गाजा के लिए प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल दरअसल डोनाल्ड ट्रंप की उस 20-सूत्रीय योजना का हिस्सा है, जिसे पिछले सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर पेश किया गया था.
इस योजना के तहत अक्टूबर में युद्धविराम की शुरुआत हुई और अब अगले चरणों में एक शांति सेना की तैनाती का प्रस्ताव है, जो हमास और इजरायल के बीच सुरक्षा और निगरानी का जिम्मा संभालेगी.
हालांकि, इस पूरे मिशन की रूपरेखा अभी भी धुंधली है. उदाहरण के लिए, बोर्ड ऑफ पीस के 11 पन्नों के चार्टर में 'गाजा' शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं है, जबकि इसकी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर का योगदान अनिवार्य किया गया है. पाकिस्तान जैसे आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे देश के लिए यह एक बड़ा रणनीतिक और वित्तीय जुआ हो सकता है, विशेष रूप से तब जब इस बोर्ड में वे देश भी शामिल हैं जिन्होंने इजरायल के साथ संबंध सामान्य कर लिए हैं.
सर्वेक्षण के जनसांख्यिकीय आंकड़े बताते हैं कि इस मुद्दे पर समर्थन लैंगिक और भौगोलिक सीमाओं से परे है. सेना भेजने के पक्ष में 78 प्रतिशत पुरुष और 68 प्रतिशत महिलाएं दिखीं, जबकि शहरी क्षेत्रों में समर्थन का स्तर 84 प्रतिशत रहा, जो ग्रामीण क्षेत्रों के 67 प्रतिशत के मुकाबले काफी अधिक है. शिक्षा के स्तर पर भी दिलचस्प आंकड़े मिले है. उच्च शिक्षा प्राप्त 84 प्रतिशत लोग इस तैनाती के समर्थन में हैं.
हालांकि, सियालकोट की संचार पेशेवर अनम नदीम जैसे आलोचक भी हैं, जिनका मानना है कि इस बल का नेतृत्व और उद्देश्य अस्पष्ट हैं. उनका तर्क है कि बिना किसी पारदर्शी जनादेश या संयुक्त राष्ट्र की स्पष्ट अनुमति के इस तरह के अमेरिकी नेतृत्व वाले ढांचे में शामिल होना पाकिस्तान को फलस्तीनी गुटों के साथ सीधे टकराव में डाल सकता है.
सर्वे में शामिल लोगों ने भी कुछ कड़ी शर्तें रखी हैं. लगभग 86 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि तैनाती के लिए फलस्तीनी नेतृत्व का औपचारिक अनुरोध आवश्यक है, जबकि 81 प्रतिशत ने संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी को अनिवार्य बताया. दिलचस्प बात यह है कि केवल 47 प्रतिशत लोगों ने अमेरिका और चीन जैसी बड़ी शक्तियों की मंजूरी को महत्वपूर्ण माना, जो यह दर्शाता है कि पाकिस्तानी जनता बाहरी दबाव के बजाय कानूनी और नैतिक आधारों को अधिक महत्व दे रही है.
राजनैतिक और सैन्य मोर्चे पर 2025 का साल पाकिस्तान के लिए काफी सक्रिय रहा है. सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की पिछले जून में डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात ने भविष्य के संकेतों को स्पष्ट कर दिया था. इसके बाद दिसंबर में कतर में अमेरिकी सेंट्रल कमांड द्वारा आयोजित सम्मेलन में पाकिस्तान की भागीदारी ने इन चर्चाओं को और बल दिया.
हालांकि, विदेश मंत्री मोहम्मद इसहाक डार ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान केवल मानवीय स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करेगा और हमास को निशस्त्रीकरण करना उसका काम नहीं है. पूर्व राजनयिक अब्दुल बासित इस पर आगाह करते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान को किसी भी ऐसी कवायद का हिस्सा नहीं बनना चाहिए जो फलस्तीनियों के संघर्ष को कमजोर करे. वह सुझाव देते हैं कि सेना के बजाय मेडिकल और इंजीनियरिंग कोर भेजना अधिक तर्कसंगत और स्वागत योग्य कदम हो सकता है.
अंततः, पाकिस्तान के लिए यह फैसला एक संतुलनकारी कृत्य जैसा है. जैसा कि विशेषज्ञ उजैर यूनुस का कहना है, जब तक पाकिस्तान सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय देशों के साथ समन्वय में है, तब तक यह जोखिम कम रहेगा. यह सर्वे सरकार को एक दिशा तो प्रदान करता है, लेकिन 'बोर्ड ऑफ पीस' की अस्पष्टता और क्षेत्र के जटिल समीकरण इस्लामाबाद के लिए आने वाले समय में एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं.