परिसीमन विधेयक संसद में पेश: उत्तर बनाम दक्षिण
नई दिल्ली । डेस्क: केंद्र सरकार ने गुरुवार को संसद में परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पेश किया, जिसके साथ ही देश में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों की विपक्षी पार्टियों ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है.
इस विधेयक के प्रस्तावों से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व की खाई और चौड़ी होने की संभावना जताई जा रही है.
क्या है नया प्रस्ताव और सीटों का गणित?
प्रस्ताव के अनुसार, जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में वर्तमान में केवल एक लोकसभा सीट है, वहां संसदीय सीटों की संख्या नहीं बढ़ेगी, हालांकि उनकी विधानसभा की सीटों में विस्तार किया जाएगा. इसमें सिक्किम, नगालैंड और मिजोरम जैसे पूर्वोत्तर राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं.
वहीं, अन्य राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में 50% तक की वृद्धि का प्रस्ताव है. विषम संख्या वाली सीटों वाले राज्यों को 'राउंडिंग अप' प्रक्रिया का लाभ मिल सकता है.
साथ ही, अनुसूचित जाति (SC) के प्रतिनिधित्व में भी मामूली बढ़ोतरी की बात कही गई है.
दक्षिण भारत में विरोध की लहर: स्टालिन और कमल हासन की चिंता
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन और अभिनेता-नेता कमल हासन ने इस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं. आलोचकों का तर्क है कि यह प्रक्रिया दक्षिण भारत के राजनीतिक प्रभाव को कम कर देगी. मुख्यमंत्री स्टालिन ने तो जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन को लेकर यहाँ तक कह दिया कि नए जोड़ों को जल्दी परिवार नियोजन के बजाय जनसंख्या वृद्धि पर विचार करना चाहिए, ताकि राजनीतिक हिस्सेदारी सुरक्षित रहे.
क्या होता है परिसीमन (Delimitation)?
परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या में आए बदलावों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना. संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का संशोधन अनिवार्य है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक प्रतिनिधि समान आबादी का प्रतिनिधित्व करे.
आंकड़ों का खेल: उत्तर बनाम दक्षिण
अगर 2031 की जनगणना के आधार पर परिसीमन होता है, तो लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 753 हो सकती हैं.
उत्तर भारत का दबदबा: उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 128, बिहार की 40 से 70 और राजस्थान की 25 से 44 होने का अनुमान है.
दक्षिण भारत का नुकसान: दक्षिण भारत की कुल हिस्सेदारी 23.7% से घटकर 19% रह सकती है.
उदाहरण के लिए, केरल की सीटें 20 से घटकर 19 हो सकती हैं, जबकि तमिलनाडु में मामूली बढ़त (39 से 41) ही दिखेगी.
वर्तमान सीटें और अनुमानित सीटें
उत्तर प्रदेश- 80 से128
बिहार- 40 से 70
महाराष्ट्र- 48 से 68
कर्नाटक- 28 से36
तमिलनाडु- 39 से 4.
विरोध के मुख्य कारण
राजनीतिक प्रभाव में कमी: हिंदी भाषी राज्यों में सीटों की संख्या लगभग 60% बढ़ सकती है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण का महत्व कम होगा.
आर्थिक योगदान बनाम प्रतिनिधित्व: तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्य देश के खजाने में सबसे अधिक योगदान देते हैं, लेकिन उन्हें रिटर्न में बहुत कम मिलता है. तुलनात्मक रूप से बिहार और यूपी जैसे राज्यों को उनके योगदान से 250-350% अधिक मिलता है.
आरक्षण का पेच: महिला आरक्षण अधिनियम (33%) और SC/ST सीटों में बदलाव इस पूरी प्रक्रिया को और जटिल बना देंगे.
भारत में परिसीमन की प्रक्रिया 1976 से जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए फ्रीज कर दी गई थी, जिसे 2001 में बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया था. अब 2026 की समय सीमा करीब आने के साथ ही 'समान प्रतिनिधित्व' और 'सफल जनसंख्या नियंत्रण' के बीच का संघर्ष एक बड़े संवैधानिक विवाद की ओर बढ़ता दिख रहा है.