पैतृक संपत्ति में बेटियों का भी बराबर हक: HC
अमरावती । डेस्क: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने पैतृक संपत्ति को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि पैतृक संपत्ति में हर एक सह-साझेदार जैसे कि बेटे और बेटियों का जन्मसिद्ध और स्वतंत्र अधिकार होता है. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति केवल अपनी हिस्सेदारी की संपत्ति पर ही निर्णय ले सकता है, वह किसी दूसरे सह-साझेदार के हक को न तो खत्म कर सकता है और न ही उसे किसी और को हस्तांतरित कर सकता है.
ऐसे में यदि कोई पिता अपनी मर्जी से पूरे पैतृक अधिकार को किसी एक संतान के नाम स्थानांतरित करता है, तो वह कानूनी रूप से वैध नहीं होगा और इससे बेटियों का अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता.
यह पूरा मामला एक पारिवारिक विवाद से जुड़ा हुआ है. इसमें एक व्यक्ति ने कथित तौर पर एक बेदखली दस्तावेज पर हस्ताक्षर करके अपनी पहली मृत पत्नी से हुए बेटे के नाम पूरी पैतृक संपत्ति ट्रांसफर कर दी थी. इस कदम से उसकी दूसरी शादी से पैदा हुईं बेटियां पैतृक संपत्ति के अधिकार से पूरी तरह वंचित हो रही थीं.
बेटियों ने अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ऐसा करना कानूनन बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है और बेटियां पैतृक संपत्ति में अपना उचित हिस्सा पाने की पूरी हकदार हैं.
न्यायालय ने कानून की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए कहा कि मिताक्षरा हिंदू कानून के तहत पैतृक संपत्ति का मूल सिद्धांत ही सामूहिक स्वामित्व और संयुक्त कब्जे पर टिका है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पैतृक संपत्ति में किसी भी सदस्य का हिस्सा तब तक तय नहीं होता जब तक कि उसका औपचारिक रूप से बंटवारा न हो जाए. पूरा परिवार सामूहिक रूप से उस संपत्ति का मालिक होता है.
यदि कोई पिता यह सोचकर पूरी संपत्ति किसी एक बेटे को सौंप देता है कि वह परिवार का मुखिया है, तो वह कानूनन गलत है. पिता सिर्फ अपने हिस्से की सीमा तक ही कोई समझौता या समर्पण कर सकता है, बेटियों के हिस्से पर उसका कोई अधिकार नहीं होता.
इसके साथ ही अदालत ने पैतृक संपत्ति और खुद की कमाई से खरीदी गई संपत्ति के बीच का अंतर भी साफ किया. कानूनी प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने अपनी मेहनत की कमाई से कोई संपत्ति खरीदी है, तो उस पर उसका पूर्ण अधिकार होता है. वह उसे अपनी मर्जी से किसी को भी बेच सकता है, उपहार में दे सकता है या वसीयत कर सकता है.
ऐसी स्थिति में बच्चे जन्मसिद्ध अधिकार का दावा नहीं कर सकते. लेकिन जब बात पीढ़ियों से चली आ रही पैतृक संपत्ति की आती है, तो वहां हर बच्चे का अधिकार बराबर होता है.
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के इस फैसले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि संपत्ति का हस्तांतरण केवल पीढ़ी बदलने से नहीं बदलता, बल्कि उसके कानूनी चरित्र पर निर्भर करता है और बेटियां अपने इस अधिकार से कभी बेदखल नहीं की जा सकतीं.