US हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग
वाशिंगटन । डेस्क: वैश्विक ऊर्जा बाजार को एक बार फिर बड़े झटके का सामना करना पड़ा है. अमेरिका और ईरान के बीच नए सिरे से शुरू हुई सैन्य तनातनी के कारण कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है. इस ताजा विवाद ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को कुछ समय से मिल रही राहत और नाजुक संघर्षविराम की उम्मीदों को पूरी तरह धराशायी कर दिया है.
बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 3 फीसदी तक की तेजी दर्ज की गई. इसके साथ ही पिछले कुछ दिनों से जारी गिरावट का दौर थम गया, जिसके तहत कीमतें युद्ध-पूर्व के स्तर पर आ गई थीं. सितंबर डिलीवरी के लिए ब्रेंट फ्यूचर्स 04:00 GMT पर 76.07 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जो 23 जून के बाद का इसका उच्चतम स्तर है.
अमेरिका की बड़ी सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंध
बाजार में यह उबाल उस वक्त आया जब अमेरिका ने ईरान पर हवाई हमले शुरू कर दिए और साथ ही ईरानी तेल पर दी गई अस्थायी प्रतिबंध छूट (सैंक्शंस वेवर) को भी रद्द कर दिया. अमेरिका का यह कड़ा फैसला ओमान की खाड़ी और लाल सागर को जोड़ने वाले रणनीतिक जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में तीन कमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों के बाद आया है.
अमेरिका, कतर और सऊदी अरब के अधिकारियों ने इन जहाजों पर हुए हमलों के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर बयान जारी कर पुष्टि की है कि उसने निर्दोष नागरिकों वाले वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने के एवज में ईरान को भारी कीमत चुकाने के लिए "शक्तिशाली हमलों की एक श्रृंखला" शुरू कर दी है.
दूसरी ओर, ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम गारीबाबादी ने अमेरिकी कदम को 17 जून को दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) का खुला उल्लंघन बताया है. उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए "निर्णायक कार्रवाई" करेगा.
क्यों बना हुआ है तनाव?
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच पुराना विवाद कभी पूरी तरह नहीं सुलझा. ईरान इस जलमार्ग को अपने नियंत्रण में मानता है, जबकि अमेरिका और बाकी दुनिया इसे एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में देखते हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान आने वाले हफ्तों में इस जलमार्ग पर अपना दबदबा और मजबूत करने की कोशिश करेगा, जिसे अमेरिका और खाड़ी देश कतई स्वीकार नहीं करेंगे. ऐसे में इस रास्ते से होने वाली तेल की सप्लाई आधी रह सकती है, जिससे आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहेंगी और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता का माहौल रहेगा.