एंटीबायोटिक के अति इस्तेमाल से गहराता संकट
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: भारत दुनिया में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक दवाओं की खपत करने वाले देशों में शामिल है, लेकिन इसके सही इस्तेमाल से जुड़ा डेटा आज भी काफी हद तक गायब है. डॉक्टर द्वारा कागज पर लिखी जाने वाली पर्चियां, बिना किसी रिकॉर्ड के दुकानों से बिकने वाली दवाएं और मरीजों के ठीक होने या न होने की जानकारी का अभाव देश के स्वास्थ्य तंत्र को अंधेरे में रख रहा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं के इस अंधाधुंध इस्तेमाल से बैक्टीरिया इतने मजबूत हो रहे हैं कि आम दवाएं असर करना बंद कर रही हैं. इस गंभीर स्थिति को 'एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस' (AMR) कहा जाता है.
स्कैनबो टेक्नोलॉजीज के संस्थापक और सीईओ आशीष रायचुरा के अनुसार, यह केवल तकनीक की कमी नहीं है, बल्कि डेटा प्रबंधन और सही नियमों के न होने की समस्या है. जब तक डॉक्टर के दवा लिखने के समय ही सही जानकारी दर्ज नहीं होगी और उसे लैब की रिपोर्ट से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक इस समस्या से निपटना नामुमकिन है.
आज सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि डॉक्टर को दवा लिखते समय यह पता ही नहीं होता कि उनके इलाके में कौन सा बैक्टीरिया कितना मजबूत हो चुका है.
देश में एंटीबायोटिक दवाओं से जुड़ा एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है. शहरों में समय की कमी, मरीजों की जल्द ठीक होने की मांग और तुरंत जांच की सुविधा न होने के कारण मामूली सर्दी-जुकाम या वायरल में भी भारी एंटीबायोटिक दवाएं दे दी जाती हैं.
दूसरी ओर, ग्रामीण इलाकों में लोग समय पर डॉक्टर तक पहुंच ही नहीं पाते या बिना सलाह के अधूरी दवाएं खा लेते हैं. यानी एक तरफ दवाओं का बेवजह इस्तेमाल हो रहा है, तो दूसरी तरफ सही मरीज तक दवा पहुंच ही नहीं पा रही है. दोनों ही स्थितियां मरीजों के शरीर में दवाओं का असर खत्म कर रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल डॉक्टरों द्वारा दवा लिखने का मामला नहीं है, बल्कि बुनियादी जांच की सुविधा न होने की सबसे बड़ी चुनौती है. जब तक लैब से रिपोर्ट आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है. ऐसे में डॉक्टरों को मजबूरी में अंदाजे से दवा लिखनी पड़ती है.
इस संकट को रोकने के लिए तुरंत और सटीक जांच सुविधाओं को हर गांव और शहर तक पहुंचाना बेहद जरूरी है. इसके साथ ही एक ऐसा डिजिटल सिस्टम बनाना होगा, जिससे डॉक्टरों को तुरंत यह जानकारी मिल सके कि उनके स्थानीय इलाके में कौन सी दवा किस बैक्टीरिया पर असर कर रही है. अगर जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में मामूली बीमारियां भी जानलेवा साबित हो सकती हैं.