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ताइवान चुनाव में भारत विरोधी पोस्टर पर बढ़ा विवाद

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19 मई 2026, 03:06 PM 4 मिनट में पढ़ें 2

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नई दिल्ली । डेस्क: ताइवान में भारतीय प्रवासी कामगारों को लेकर शुरू हुआ एक स्थानीय राजनीतिक विवाद अब नस्लवाद, चुनावी राजनीति और भारत-ताइवान संबंधों पर एक व्यापक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बहस में बदल गया है. मामला उस समय गरमा गया जब काऊशुंग (Kaohsiung) के एक स्थानीय स्वतंत्र उम्मीदवार ली हंग-यी (Lee Hung-yi) ने अपने चुनावी अभियान के तहत "भारतीयों पर प्रतिबंध" लगाने का वादा करने वाला एक विवादित बिलबोर्ड लगाया. इस पोस्टर में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज और पगड़ी पहने एक व्यक्ति की तस्वीर के ऊपर निषेध (प्रतिबंध) का प्रतीक चिन्ह दिखाया गया था, जिसने ताइवान में रह रहे भारतीयों और कई राजनीतिक विश्लेषकों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है.


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— Ian Miles Cheong (@ianmiles) May 18, 2026


विवाद की शुरुआत और नस्लीय भेदभाव के आरोप


यह पूरा विवाद ताइवान की सेंट्रल न्यूज एजेंसी (CNA) द्वारा दी गई जानकारी के बाद और तेजी से फैला. काऊशुंग के सिआओगांग जिले के वार्ड प्रमुख ली हंग-यी, जो आगामी नवंबर में होने वाले नगर परिषद चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ रहे हैं, ने अपने इस विवादित बिलबोर्ड का बचाव किया है. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वह ताइवान सरकार द्वारा भारत से प्रवासी मजदूरों को लाने की योजना का विरोध कर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने दावा किया कि वे सामान्य रूप से प्रवासी श्रम के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उनका विरोध विशेष रूप से भारत के श्रमिकों को लेकर है.


इस कदम की सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हुई है. ताइवान में रहने वाले भारतीय मूल के एक निवासी ने इसे " blatant and direct racial discrimination" (खुला और प्रत्यक्ष नस्लीय भेदभाव) करार दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि प्रवासी श्रमिक नीति पर अलग राजनीतिक रुख होना स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन किसी देश के सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों, जैसे कि सिखों की पगड़ी, का उपयोग करके इस तरह से विरोध प्रदर्शन करना पूरी तरह से गलत है. न्यू पावर पार्टी के काऊशुंग चैप्टर के प्रमुख वांग यी-हेंग ने भी इस अभियान की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे "पूरी तरह से अज्ञानता से भरा" कदम बताया.


चुनावी राजनीति और बीजिंग का एंगल


राजनीतिक विश्लेषकों और ताइवान मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद भारतीयों के खिलाफ वास्तविक नफरत से ज्यादा आगामी स्थानीय चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा रहा एक राजनीतिक ध्रुवीकरण है. ताइवान मामलों की विशेषज्ञ सना हाशमी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर स्पष्ट किया कि यह मुद्दा पुराना है और इसे एक ऐसे स्वतंत्र उम्मीदवार द्वारा हवा दी जा रही है जिसका सत्ताधारी दल से कोई आधिकारिक संबंध नहीं है. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विवाद सामने आने के बाद ताइवान के कई राजनेताओं और आम जनता ने इस बिलबोर्ड की आलोचना की है और भारतीयों का समर्थन किया है. उन्होंने जोर देकर कहा कि ताइवान को भारत के बारे में पुरानी रूढ़ियों से बाहर निकलकर लोगों को शिक्षित करने की आवश्यकता है.



सना हाशमी ने यह भी आरोप लगाया कि विपक्षी दल कुओमिंतांग (KMT) इस साल के अंत में होने वाले स्थानीय चुनावों में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए भारत-ताइवान श्रम समझौते को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. इसके अलावा, भारत-ताइवान के मजबूत होते संबंधों का विरोध करके कुछ राजनीतिक ताकतें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) को भी खुश करना चाहती हैं, क्योंकि बीजिंग हमेशा से भारत और ताइवान की नजदीकियों का विरोध करता रहा है.


क्या है भारत-ताइवान श्रम समझौता?


ताइवान लंबे समय से अपने विनिर्माण (manufacturing), कृषि और देखभाल (caregiving) जैसे क्षेत्रों में मजदूरों की भारी कमी से जूझ रहा है. इस कमी को पूरा करने के लिए ताइवान सरकार ने भारत के साथ एक समझौता किया है. हाल ही में ताइवान के श्रम मंत्री हुंग सुन-हान ने संसद को सूचित किया था कि लगभग 1,000 भारतीय श्रमिकों का पहला बैच इस वर्ष के अंत तक ताइवान पहुंच सकता है. वर्तमान में दोनों देशों के बीच प्रशासनिक प्रक्रियाओं, स्वास्थ्य जांच और दस्तावेजों के सत्यापन का काम अंतिम चरण में है.


तक्षशिला संस्थान की अनुसंधान विश्लेषक अनुष्का सक्सेना के अनुसार, दोनों देशों के संबंधों में असली चुनौती इस तरह के छिटपुट राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि सहयोग की धीमी गति और नौकरशाही की अड़चनें हैं. भारत और ताइवान के बीच समुद्री सहयोग, साइबर संवाद और निवेश जैसे क्षेत्रों में पहले से ही रूपरेखा तैयार है, लेकिन इसे जमीन पर उतारने की रफ्तार को तेज करने की जरूरत है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP