पति के बरी होने पर भी केस लड़ना मानसिक क्रूरता, HC ने दी तलाक को मंजूरी
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पति और उसके परिवार के खिलाफ आपराधिक और घरेलू हिंसा के मामलों को बरी किए जाने के बाद भी लगातार आगे बढ़ाने को मानसिक क्रूरता करार देते हुए एक दंपति के विवाह को समाप्त कर दिया है. न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की पीठ ने पारिवारिक अदालत के उस 2019 के फैसले को रद्द कर दिया, जिसने पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी.
उच्च न्यायालय ने कहा कि बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ पत्नी द्वारा अपील दायर करना यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वह पति और उसके परिजनों को लगातार परेशान करना चाहती थी, जिससे पति को अत्यधिक मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और तनाव का सामना करना पड़ा.
पति ने शुरुआत में पत्नी के दुर्व्यवहार, गाली-गलौज, मारपीट और विवाह से पहले उसकी मानसिक बीमारी की बात छिपाने का आरोप लगाते हुए क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की थी.
वहीं पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए ससुराल पक्ष पर 5 लाख रुपये दहेज मांगने और प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था.
इस मामले में पारिवारिक अदालत ने पति की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा.
उच्च न्यायालय ने माना कि पत्नी की मानसिक बीमारी के पुख्ता सबूत तो दर्ज नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से उसने निचली अदालत से बरी होने के बाद भी आपराधिक अपील और घरेलू हिंसा के खारिज आवेदनों के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील जारी रखी, वह पति के प्रति मानसिक क्रूरता के समान है. अदालत ने मामले के समग्र परिस्थितियों को देखते हुए पति की अपील स्वीकार कर विवाह विच्छेद का आदेश दिया.