जापान के आक्रामक सैन्यीकरण का चीन द्वारा विरोध
बीजिंग । डेस्क: चीन के ग्लोबल टाइम्स के हवाले से खबर है कि जापान द्वारा अपने तीन प्रमुख सुरक्षा दस्तावेजों को संशोधित करने के प्रस्ताव पर चीन ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. चीन ने बुधवार को जापान के इस कदम की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए आरोप लगाया कि टोक्यो अपने 'पुनः सैन्यीकरण' की महत्वाकांक्षाओं को छिपाने के लिए बीजिंग की सामान्य सैन्य गतिविधियों को बदनाम कर रहा है.
चीनी विदेश मंत्रालय ने वैश्विक समुदाय से अपील की है कि वे जापान के इस आक्रामक रुख को लेकर पूरी तरह सतर्क रहें. दरअसल, जापान की सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) ने हाल ही में अपने रक्षा क्षेत्र और सैन्य उद्योगों को अभूतपूर्व संस्थागत सहायता देने वाले एक नए सुरक्षा मसौदे को मंजूरी दी है, जिसके बाद से दोनों पड़ोसियों के बीच राजनयिक और रणनीतिक तनाव चरम पर पहुंच गया है.
'चीन के खतरे' का बहाना और जापान की सैन्य महत्वाकांक्षा:
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने एक नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जापान के इस नए नीतिगत कदम को कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कहा कि यह मसौदा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि जापान की कुछ ताकतें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तय किए गए वैश्विक मानदंडों को तोड़ना चाहती हैं.
चीन का मानना है कि टोक्यो जानबूझकर 'चीन के खतरे' का हौव्वा खड़ा कर रहा है ताकि वह अपनी घरेलू जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आंखों में धूल झोंक सके.
चीनी विशेषज्ञों के अनुसार, जापान अपने इस कथित खतरे का इस्तेमाल देश के भीतर रक्षा बजट बढ़ाने और शांतिवादी संविधान की सीमाओं को कमजोर करने के लिए एक मजबूत बहाने के तौर पर कर रहा है. इस पूरी कवायद को सानाए ताकाइची प्रशासन के तहत जापान के एक नए 'नव-सैन्यवादी' एजेंडे के रूप में देखा जा रहा है.
राष्ट्रीय नीतियों में युद्ध की तैयारियों को शामिल करने का आरोप:
चीनी राजनयिकों ने आरोप लगाया कि जापान अब युद्ध की तैयारियों और सैन्य विस्तार को केवल अपनी सेना तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि इसे अपनी राष्ट्रीय संस्थाओं, आर्थिक बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहा है. चीन का दावा है कि ऐसा करके जापान अपने ही संविधान, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और घरेलू प्रतिबंधों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है.
बीजिंग ने चेतावनी दी है कि जापान का यह खतरनाक रास्ता न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देता है, बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक वास्तविक खतरा बनता जा रहा है. चीनी पक्ष ने जोर देकर कहा कि इस सैन्यवादी प्रवृत्ति को शुरुआत में ही रोकने के लिए पूरी दुनिया को एकजुट होना होगा.
रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी और जनता पर आर्थिक बोझ:
जापानी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस नए मसौदे में न केवल देश की सैन्य क्षमता को मजबूत करने की वकालत की गई है, बल्कि रक्षा खर्च में भी भारी बढ़ोतरी की सिफारिश की गई है. एलडीपी इस महीने के अंत तक इन सिफारिशों को सरकार के समक्ष पेश करने वाली है, जिसके बाद दिसंबर में कैबिनेट की बैठक के दौरान इन तीन प्रमुख सुरक्षा दस्तावेजों को अंतिम मंजूरी दे दी जाएगी.
हालांकि, इस भारी-भरकम सैन्य बजट के कारण जापानी विशेषज्ञों ने खुद आशंका जताई है कि रक्षा खर्चों में इस अप्रत्याशित वृद्धि का सीधा और बड़ा आर्थिक बोझ जापान की आम जनता पर पड़ेगा, जिससे देश की घरेलू अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
नए रक्षा संगठनों का गठन और हथियारों के निर्यात पर जोर:
अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाने के लिए जापान केवल रणनीतिक दस्तावेजों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह जमीन पर भी बड़े कदम उठा रहा है. जापान सरकार अब एक विशेष नए संगठन की स्थापना पर विचार कर रही है जो निजी कंपनियों के माध्यम से हथियारों और सैन्य उपकरणों के निर्यात को बढ़ावा देगा.
इसे 'विदेशी सैन्य बिक्री' (एफएमएस) का जापानी संस्करण कहा जा रहा है, जिसमें सरकार खुद एक मध्यस्थ की भूमिका निभाएगी. जापान ने पहले ही अपनी रणनीतियों के तहत ऑस्ट्रेलिया को मोगामी-क्लास डिस्ट्रॉयर्स जैसे घातक हथियारों के निर्यात की योजना तैयार कर ली है, जिससे यह साफ है कि वह अपनी दशकों पुरानी रक्षात्मक नीतियों को पीछे छोड़ चुका है.
जापान के भीतर और पड़ोसी देशों में बढ़ता विरोध:
जापान के इस आक्रामक सैन्यीकरण का विरोध न केवल विदेशों में हो रहा है, बल्कि खुद जापान के भीतर भी इसके खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं. जापान फेडरेशन ऑफ बार एसोसिएशंस ने हथियारों के निर्यात पर लगी पाबंदियों को हटाने का कड़ा विरोध किया है.
वकीलों के इस प्रमुख संगठन ने चेतावनी दी है कि जापानी हथियारों का वैश्विक बाजार में जाना दुनिया भर के संघर्षों को और अधिक भड़काएगा और इससे जापान की शांतिवादी पहचान हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.
इसके अलावा, फिलीपींस जैसे पड़ोसी देशों के नागरिक भी जापान की इस बढ़ती सैन्य सक्रियता से डरे हुए हैं. क्षेत्रीय जानकारों का मानना है कि अमेरिका और जापान के नेतृत्व वाली इन सैन्य रणनीतियों के कारण पूरा एशिया-प्रशांत क्षेत्र फिर से युद्ध के मुहाने पर आकर खड़ा हो सकता है, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध जैसी भयानक यादें एक बार फिर ताजा हो रही हैं.