छत्तीसगढ़ में जानलेवा प्लास्टिक कचरे का हर घंटे 6 टन उत्पादन
छत्तीसगढ़ में प्लास्टिक कचरे का बेतहासा उत्पादन जानलेवा
रायपुर | ममता मानकरः छत्तीसगढ़ में हर घंटे लगभग 6 टन प्लास्टिक कचरे का उत्पादन हो रहा है? यह कचरा हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है और यही हिस्सा जानलेवा साबित हो रहा है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि देश में एक लाख से अधिक लोग इसी कचरे के कारण हार्ट अटैक या हार्ट फेल का शिकार हो कर मौत के मुंह में समा रहे हैं.
हर दिन जिस प्लास्टिक का हम उपयोग कर रहे हैं, उसका कचरा हमारे लिए जानलेवा साबित हो रहा है. वही प्लास्टिक, जिसे हम घर, दफ्तर और दूसरी जगहों पर इस्तेमाल कर रहे हैं.
इस प्लास्टिक में मौजूद लचीला या मुलायम बनाने वाले केमिकल डाइ-2-एथाइलहेक्सिल फ्थेलेट (DEHP) यानी फ्थेलेट्स, भारत में ह्रदय रोग से होने वाली 1,03,587 मौतों के लिए जिम्मेवार माना गया है.
भारत में सबसे ज्यादा मौतें
एक शोध से पता चलता है कि इस प्लास्टिक कचरे के कारण दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया, मिडल ईस्ट और पैसिफिक देशों में मौतों का कहीं अधिक खतरा है और इनमें भारत पहले स्थान पर है.
ईबायोमेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित इस रिसर्च में पाया गया कि भारत में प्लास्टिक कचरे के कारण सबसे ज़्यादा 103,587 मौतें हुईं, जिसके बाद चीन और इंडोनेशिया का स्थान रहा.
इसमें यह भी पाया गया कि 3.5 लाख मौतों में से लगभग तीन चौथाई दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व, पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में हुईं, जहां फ्थेलेट्स का उपयोग व्यापक रूप से किया जाता है.
प्लास्टिक को नरम बनाने केमिकल का उपयोग
न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में एक टीम ने 200 देशों और क्षेत्रों में फ्थेलेट्स के संपर्क का अनुमान लगाने के लिए जनसंख्या सर्वेक्षणों से स्वास्थ्य और पर्यावरण डेटा का विश्लेषण किया.
DEHP और संबंधित स्वास्थ्य जोखिमों पर किए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों के लिए मुख्य चिंता का विषय 'di-2-एथिलहेक्सिल फ्थेलेट (DEHP)'था. यह केमिकल खाद्य कंटेनरों जैसी चीज़ों में प्लास्टिक को नरम और ज्यादा लचीला बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और भारत में इसका उपयोग बेतहशा हो रहा है.
छत्तीसगढ़ में बेतहाशा प्लास्टिक कचरा
छत्तीसगढ़ में हर घंटे 6 टन प्लास्टिक कचरा का उत्पादन यानी हर दिन 140 टन प्लास्टिक कचरा.
2022-23 के केंद्र सरकार के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार छत्तीसगढ़ में 51,100 टन प्लास्टिक कचरे का उत्पादन हुआ.
देश में प्लास्टिक कचरा उत्पादन की बात करें तो यह आंकड़ा 2018-19 में 33.6 लाख टीपीए (टन प्रति वर्ष), 2019-20 में 34.69 लाख टीपीए, 2020-21 में 41.26 लाख टीपीए, 2021-22 में 39.01 लाख टीपीए और 2022-23 में 41.36 लाख टीपीए तक पहुंच गया.
प्लास्टिक कचरे से जूझता देश
आंकड़ों से पता चलता है कि भारत बढ़ते प्लास्टिक कचरे के संकट से जूझ रहा है, जो सालाना 41.36 लाख टन प्लास्टिक पैदा करता है.
तमिलनाडु सबसे बड़ा प्लास्टिक प्रदूषक है, जो हर साल 7.82 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा करता है. इसके बाद तेलंगाना है, जो 5.28 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा करता है.
दिल्ली, एक छोटा राज्य होने के बावजूद, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों से आगे निकलकर सालाना 4.03 लाख टन के साथ तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है.
लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया कि इस प्लास्टिक कचरे का सबसे ज्यादा असर दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया, मिडल ईस्ट और पैसिफिक देशों में देखा गया.
गौरतलब है कि दुनिया भर में इस केमिकल से होने वाली तीन-चौथाई मौतें इन क्षेत्रों में दर्ज की गईं.
शोधकर्ताओं के मुताबिक जिन क्षेत्रों में प्लास्टिक का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, वहां निर्माण से जुड़े कड़े नियमों की कमी के कारण लोग इन हानिकारक रसायनों के संपर्क में आ रहे हैं.
कैसे नुकसान पहुंचा रहा प्लास्टिक?
प्लास्टिक में उपयोग होने वाले इन केमिकल्स को ‘फ्थेलेट्स’ कहा जाता है. ये प्लास्टिक के डिब्बों, कॉस्मेटिक उत्पादों, डिटर्जेंट, कीटनाशक, पाइपों और मेडिकल उपकरणों में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाते हैं.
ये केमिकल सूक्ष्म कणों में बदलकर हमारे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. शोधकर्ताओं के मुताबिक शरीर में पहुंचने पर ये केमिकल मोटापा, डायबिटीज, कैंसर और प्रजनन से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं.
अपने इस नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 200 देशों में लोगों के यूरीन सैंपल और मृत्यु दर के आंकड़ों का विश्लेषण किया. इसमें पाया गया कि प्लास्टिक के इन रसायनों के संपर्क में ज्यादा आने वाले लोगों में दिल की बीमारियों का खतरा भी अधिक था.
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि फ्थेलेट्स से दिल की बीमारियों का खतरा दुनिया के हर हिस्से में एक जैसा नहीं है, कहीं ज्यादा तो कहीं कम है.
अध्ययन से पता चला कि यह केमिकल शरीर में पहुंचकर दिल की धमनियों में सूजन पैदा कर देता है. यह सूजन समय के साथ दिल का दौरा या स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है.
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 2018 में 55 से 64 साल की उम्र के लोगों में दिल की बीमारी से हुई 13 फीसदी मौतों के पीछे DEHP का हाथ हो सकता है.
मानव स्वास्थ्य के लिये बहुत बड़ा खतरा
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ मेडिसिन की एसोसिएट रिसर्च साइंटिस्ट, प्रमुख लेखिका सारा हाइमन ने कहा, "फ्थेलेट्स और दुनिया भर में मौत के एक प्रमुख कारण के बीच संबंध को उजागर करके, रिसर्च के निष्कर्ष इस बात के सबूत हैं कि ये रसायन मानव स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ा खतरा पेश करते हैं.
लेखकों ने लिखा, "2018 में, दुनिया भर में अनुमानित 356,238 मौतें DEHP जोखिम के कारण हुईं, जो 55-64 वर्ष की आयु के व्यक्तियों में सभी हृदय संबंधी मौतों का 13.497 प्रतिशत है."
अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर लियोनार्डो ट्रासांडे के मुताबिक, फ्थेलेट जैसे केमिकल्स के कारण दिल की बीमारी का खतरा सिर्फ अमीर देशों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि तेजी से औद्योगीकरण के रास्ते पर चल रहे कमजोर और मध्यम आय वाले देशों के लिए यह केमिकल बड़ी समस्या बन चुके हैं. ऐसे में दुनिया भर में इन केमिकल्स के इस्तेमाल पर कड़ी निगरानी और नियमों की जरूरत है.
फ्थेलेट्स के संपर्क में आने से जोखिम बढ़ा
इससे पहले भी 2021 में किए गए एक अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने 'फ्थेलेट्स' को हर साल 50,000 से ज्यादा असमय मौतों से जोड़ा था, जिनमें अधिकांश मौतें अमरीका में हृदय रोग से हुई थीं.
वहीं यह नया अध्ययन अब तक का पहला वैश्विक अनुमान है, जो इन रसायनों के संपर्क से होने वाली हृदय संबंधित मौतों या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या का आकलन करता है.
शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि अध्ययन यह नहीं कहता कि सिर्फ 'DEHP' ही मौतों का सीधा कारण है. हालांकि इन मौतों में उसकी भूमिका जरूर रही है.
इसी तरह इस अध्ययन में अन्य फ्थेलेट्स और दूसरे आयु वर्ग के लोगों को शामिल नहीं किया गया है, इसलिए हकीकत में मौतों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.
डब्ल्यूएचओ ने भी चेताया
शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत में तेजी से विस्तार करने वाला प्लास्टिक उद्योग है और प्लास्टिक कचरे और इस वस्तु के व्यापक उपयोग के कारण फ्थेलेट्स के संपर्क में आने से काफी जोखिम का सामना करना पड़ता है.
वहीं डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 2016 में अनुमानित 17.9 मिलियन लोग सीवीडी से मर गए, जो वैश्विक मौतों का 31% है. इन मौतों में से 85% दिल के दौरे और स्ट्रोक के कारण हुईं.
2016 में भारत में कुल मौतों में से 63% एन.सी.डी. के कारण हुईं, जिनमें से 27% सी.वी.डी. के कारण हुईं. सी.वी.डी. 40-69 वर्ष आयु वर्ग में 45% मौतों के लिए जिम्मेदार थे.
प्लास्टिक का उपयोग कम करना ही निदान
अपनी सुविधा के लिए हम लगातार प्लास्टिक का इस्तेमाल कर रहे हैं. फ्थेलेट्स जैसे केमिकल्स हमारे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं. ईबायोमेडिसिन का यह रिसर्च भारत के लिए बेहद ज़रूरी है, जिससे लोग खुद से ही प्लास्टिक का उपयोग कम से कम कर अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ से बच सकें.
शोधकर्ताओं ने जोर देकर कहा है कि इन जहरीले रसायनों के असर को कम करने के लिए दुनिया भर में सख्त नियम बनाने की जरूरत है.
खासकर उन इलाकों में जहां तेजी से औद्योगीकरण और प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ रहा है. काश, हमारे नीति निर्धारक और समाज को भी इस कचरे के बारे में सोचने की फुर्सत होती.