छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण पर शीर्ष माओवादी रूपेश का बड़ा बयान
बस्तर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ में एक ही दिन में 210 नक्सलियों के हथियार डालने की अब तक की सबसे बड़ी घटना के बाद, शीर्ष माओवादी कमांडर रूपेश उर्फ तक्कालापल्ली वासुदेव राव (सतीश) ने इसे 'सशर्त आत्मसमर्पण' बताया है. सीपीआई (माओवादी) के उत्तर-पश्चिम उप-क्षेत्रीय ब्यूरो का नेतृत्व कर रहे रूपेश ने एक वीडियो संदेश जारी कर दावा किया है कि उन्होंने और उनके सहयोगियों ने हथियार डालने का फैसला तभी किया जब सरकार उनकी तीन प्रमुख माँगों पर सहमत हो गई.
माओवादियों के इस समूह ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से "लोगों के लिए और लोगों के साथ काम करने" की सहमति जताई है, लेकिन रूपेश ने स्पष्ट किया कि वे न तो डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) में शामिल होंगे और न ही उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध किसी गतिविधि में शामिल होने के लिए मजबूर किया जाएगा.
प्रमुख माँगें: DRG में शामिल न होने और 'मूलवासी बचाओ मंच' से प्रतिबंध हटाने की मांग
एक स्थानीय समाचार आउटलेट से बात करते हुए, रूपेश ने 'आत्मसमर्पण' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा, "हम इसे 'आत्मसमर्पण' नहीं कहना चाहते. हमने कुछ माँगें रखी थीं, जो हमारे व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बल्कि जनता और आदिवासी लोगों से जुड़े मुद्दों के लिए थीं, जिनके लिए हम लड़ रहे थे." उन्होंने कहा कि उनके हथियार डालने की तीन मुख्य शर्तें थीं:
उन्हें DRG में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा.
कौशल विकास प्रशिक्षण (skill development training) के लिए उन पर कोई दबाव नहीं डाला जाएगा.
सबसे महत्वपूर्ण, सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए गए 'मूलवासी बचाओ मंच' पर से प्रतिबंध हटाया जाए और आरोपी के रूप में जेलों में बंद लोगों को रिहा किया जाए.
सशस्त्र संघर्ष छोड़ने का कारण और आगे की राह-
रूपेश ने कहा कि मुख्यधारा में लौटने का फैसला राज्य के गृह मंत्री और सुरक्षा एजेंसियों के साथ महीनों के संवाद के बाद लिया गया. उन्होंने स्वीकार किया कि अब वे सशस्त्र संघर्ष जारी नहीं रख सकते थे, क्योंकि उन्होंने अपने कई साथी खो दिए थे और जीवित रहना उनकी पहली प्राथमिकता बन गई थी.
उन्होंने कहा, "हालांकि, हमारा लक्ष्य वही रहेगा-उन लोगों के अधिकारों के लिए काम करना जिनके लिए हमने कभी लड़ाई लड़ी थी, लेकिन अब शांतिपूर्ण तरीकों से." उन्होंने आदिवासियों के जबरन विस्थापन को रोकने, PESA अधिनियम में संशोधन करने, और अबुझमाड़ को संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा प्रदान करने जैसी अन्य माँगें भी सरकार के सामने रखीं.
रूपेश ने माओवादी रैंकों के भीतर आंतरिक मतभेदों को स्वीकार किया और जंगलों में बचे हुए कैडरों से "वास्तविकता पर चिंतन" करने का आग्रह किया.