HC: 22 साल की देरी से हुआ गोदनामा अमान्य, अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति को दत्तक पुत्र (गोद लिया हुआ बेटा) घोषित करने वाले निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है. न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकल पीठ ने रेलवे प्रशासन द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत 'देने और लेने' (Give-and-Take) की रस्म एक अनिवार्य कानूनी शर्त है, जिसे साबित करने में दावेदार विफल रहा.
अदालत ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि कथित गोद लेने की घटना 1976 की बताई गई, जबकि उसका पंजीकरण 22 साल की लंबी देरी के बाद 1998 में कराया गया, जो कि संदेह पैदा करता है.
यह पूरा मामला रेलवे कर्मचारी स्वर्गीय राव और उनकी पत्नी लक्ष्मी बाई से जुड़ा है, जिनका कोई जैविक बच्चा नहीं था.
दावेदार का कहना था कि वर्ष 1976 में जब वह महज 5-6 वर्ष का था, तब उसके जैविक पिता ने उसे राव को गोद दे दिया था. व्यक्ति का दावा था कि वह बचपन से ही उनके साथ रहा और राव ने अपने सर्विस रिकॉर्ड व भविष्य निधि (PF) में उसे अपना पुत्र बताते हुए नामांकित भी किया था.
हालांकि, वर्ष 2001 में राव की मृत्यु के बाद जब व्यक्ति ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, तो रेलवे प्रशासन ने उसके गोदनामे को संदिग्ध मानते हुए आवेदन खारिज कर दिया. इसके बाद निचली अदालत ने उसे दत्तक पुत्र घोषित कर दिया था, जिसे रेलवे ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का सूक्ष्मता से अवलोकन करने के बाद पाया कि गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास था. कोर्ट ने नोट किया कि किसी भी गवाह ने उस स्थान या विशिष्ट समुदाय के सदस्यों का नाम नहीं बताया जिनकी उपस्थिति में 'देने और लेने' की रस्म हुई थी. यहाँ तक कि गवाहों के बयानों में उस मौसम को लेकर भी एकरूपता नहीं थी जिसमें गोद लेने की प्रक्रिया संपन्न हुई थी.
रेलवे की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि जिस समय 1998 में गोदनामा पंजीकृत हुआ, उस समय व्यक्ति की आयु 21 वर्ष से अधिक थी, जबकि कानूनन 15 वर्ष से अधिक आयु के बच्चे को गोद नहीं लिया जा सकता.
कोर्ट ने माना कि केवल सर्विस रिकॉर्ड में नाम होने से कानूनी रूप से गोद लेना सिद्ध नहीं होता. साक्ष्यों के अभाव और प्रक्रियागत खामियों के कारण हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को कानून की नजर में अस्थिर मानते हुए उसे पूरी तरह से खारिज कर दिया.