HC: RTE की खाली सीटों के लिए पारदर्शी तंत्र बनाए सरकार
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत स्कूलों में शेष बची सीटों को भरने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश दिया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सी.वी. भगवंत राव द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि नया शैक्षणिक सत्र 1 अप्रैल से शुरू हो चुका है, इसलिए सरकार को अगली सुनवाई से पहले इन खाली सीटों के आवंटन के लिए एक ठोस और स्पष्ट योजना प्रस्तुत करनी होगी.
स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, राज्य में उपलब्ध 21,975 सीटों के लिए कुल 38,439 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें से 27,203 आवेदन वैध पाए गए.
15 अप्रैल को आयोजित लॉटरी के माध्यम से अब तक 15,426 सीटें आवंटित की जा चुकी हैं और चयनित छात्रों को 31 मई तक प्रवेश प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं.
इसी सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने सेंट जेवियर्स स्कूल के परिसरों के विलय से जुड़े एक हस्तक्षेप आवेदन पर विचार करने से इनकार कर दिया.
अदालत ने कहा कि वर्तमान जनहित याचिका इस विशिष्ट मुद्दे को कवर नहीं करती है, हालांकि प्रभावित पक्ष को उचित मंच पर इस फैसले को चुनौती देने की छूट दी गई है. मामले की अगली सुनवाई अब 7 मई को निर्धारित की गई है.
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम क्या है?
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, जिसे आधिकारिक तौर पर 'निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' के रूप में जाना जाता है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का कानूनी प्रावधान करता है.
1 अप्रैल 2010 को लागू हुए इस ऐतिहासिक कानून का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश का कोई भी बच्चा आर्थिक तंगी या सामाजिक असमानता के कारण शिक्षा से वंचित न रहे. इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) और वंचित समूहों के बच्चों के लिए प्रवेश स्तर की कक्षाओं में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का नियम है, जिसका पूरा खर्च सरकार वहन करती है.
यह कानून केवल प्रवेश ही नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी जोर देता है, जिसके तहत स्कूलों के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचे, खेल के मैदान, प्रशिक्षित शिक्षकों और छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) जैसे कड़े मानक निर्धारित किए गए हैं.
इसके साथ ही, यह अधिनियम बच्चों के शारीरिक दंड, मानसिक उत्पीड़न और बिना मान्यता के स्कूल चलाने जैसी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है.
बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए इसमें 'निरंतर और व्यापक मूल्यांकन' (CCE) पर बल दिया गया है और यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी बच्चे को प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक स्कूल से बाहर न निकाला जाए या उसे फेल न किया जाए.
इसके अलावा, अधिनियम यह जिम्मेदारी भी तय करता है कि स्कूल की दूरी बच्चे के घर से सुलभ सीमा (आमतौर पर 1 से 3 किलोमीटर) के भीतर हो, ताकि पहुंच की समस्या शिक्षा के मार्ग में बाधा न बने.