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HC ने अवैध उगाही के आरोपों पर समझौता आवेदन खारिज किया

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22 सित. 2025, 12:25 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अवैध उगाही और सेवानिवृत्ति बकाया राशि के दुरुपयोग के आरोपों से संबंधित एक समझौता आवेदन को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आरोप निजी प्रकृति के नहीं हैं और इनका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है.


मामला एक याचिका से संबंधित है जिसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(4), 61(2), 338, 336(3), 340(2) और 3(5) के तहत दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) को रद्द करने की मांग की गई थी. याचिका में दावा किया गया था कि एफआईआर अवैध है और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है.


मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने कहा, "याचिकाकर्ता, जो एक सरकारी कर्मचारी है, के खिलाफ अवैध उगाही, सेवानिवृत्ति बकाया राशि के दुरुपयोग और नैतिक अधमता से संबंधित आरोप हैं. ऐसे अपराध निजी प्रकृति के नहीं हैं; ये समाज और शासन में जनता के विश्वास पर व्यापक प्रभाव डालते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने लक्ष्मी नारायण मामले में स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग या नैतिक अधमता से संबंधित अपराधों को केवल समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता."


मामले का विवरण


प्राथमिकी याचिकाकर्ता और सह-अभियुक्त के खिलाफ बीएनएस की धारा 61(2), 318(4) और 3(5) के तहत दर्ज की गई थी. शिकायतकर्ता, जो गेश्नारायण कंवर की विधवा हैं, ने आरोप लगाया कि उनके पति गारियाबंद जिले के बोरीद में सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक थे. याचिकाकर्ता ने उनसे मृत्यु पश्चात पेंशन और ग्रेच्युटी जैसी सेवानिवृत्ति बकाया राशि के लिए 2 लाख रुपये की मांग की थी. शिकायतकर्ता को एक खाली चेक देना पड़ा, लेकिन बाद में पता चला कि उनके खाते से 2,80,000 रुपये की धोखाधड़ी से निकासी की गई थी. इसके बावजूद, पेंशन और बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया.


कोर्ट का तर्क


खंडपीठ ने ध्यान दिया कि शिकायतकर्ता ने बीएनएस की धारा 359(2)(8) के तहत समझौता आवेदन दायर किया था, जिसमें दावा किया गया कि याचिकाकर्ता के साथ विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझ गया है. हालांकि, कोर्ट ने इस आवेदन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.


खंडपीठ ने कहा, "यह एक स्थापित सिद्धांत है कि बीएनएस की धारा 528 या सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एफआईआर को रद्द करने की शक्ति का उपयोग सावधानीपूर्वक और केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल, नेहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र, और स्टेट ऑफ एम.पी. बनाम लक्ष्मी नारायण जैसे मामलों में स्पष्ट किया है कि जहां एफआईआर में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, वहां जांच को अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने देना चाहिए. केवल समझौते के आधार पर ऐसी कार्यवाही को समय से पहले रोक नहीं किया जा सकता."


कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप नैतिक अधमता से संबंधित हैं और अपराध निजी प्रकृति के नहीं हैं. साथ ही, दोनों पक्षों के बीच कोई लिखित समझौता नहीं हुआ था. एक समान मामले में सह-अभियुक्त की याचिका को पहले ही हाईकोर्ट द्वारा खारिज किया जा चुका था.


इस प्रकार, कोर्ट ने एफआईआर को रद्द करने के लिए कोई आधार न होने का हवाला देते हुए समझौता आवेदन को खारिज कर दिया और याचिका को निरस्त कर दिया.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP