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हाईकोर्ट ने UAPA मामले में जमानत से इनकार किया

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22 जुल. 2025, 05:10 PM 4 मिनट में पढ़ें 1

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में तीन आरोपियों की जमानत याचिका को खारिज कर दिया, जिन पर 17 नवंबर 2023 को हुये एक विनाशकारी आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विस्फोट में शामिल होने का आरोप है. इस हमले में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के कांस्टेबल जोगेंद्र कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए थे और बाद में उनकी मृत्यु हो गई. 


मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि लंबी हिरासत या सामाजिक-आर्थिक कठिनाइयों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोपों के सामने प्राथमिकता नहीं दी जा सकती.

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घटना उस समय हुई जब मतदान प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सुरक्षा बलों की एक टुकड़ी बडे़गोबरा के पास लौट रही थी. इस दौरान एक पूर्व नियोजित आईईडी विस्फोट हुआ, जिसने कांस्टेबल जोगेंद्र कुमार को गंभीर रूप से घायल कर दिया, और बाद में उनकी शहादत हो गई. 


इस मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147, 148, 149, 302, 307, 120-बी, 121, 121-ए के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 की धारा 4, 5, और 6, शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 25 और 27, और गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 16, 17, 18, 20, 23, 38, 39 और 40 के तहत मामला दर्ज किया गया.


आरोपियों को 14 जून 2024 को हिरासत में लिया गया था. इसके बाद, उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 483 के तहत जमानत के लिये आवेदन किया, जिसे रायपुर के विशेष न्यायाधीश (एनआईए) ने खारिज कर दिया. इस आदेश को चुनौती देते हुये, आरोपियों ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम की धारा 21(4) के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की.


हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यूएपीए की धारा 43डी(5) का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि यदि कोर्ट को केस डायरी या आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत दायर रिपोर्ट के आधार पर यह विश्वास करने के लिए उचित आधार मिलते हैं कि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य हैं, तो यूएपीए के अध्याय IV और VI के तहत दंडनीय अपराधों के आरोपी को जमानत या निजी मुचलके पर रिहा नहीं किया जा सकता. 


कोर्ट ने कहा, “जब प्रथम दृष्टया आरोप सत्य प्रतीत होते हैं, तो धारा 43डी(5) का प्रतिबंध लागू होता है, और कोर्ट को ऐसे आरोपियों को जमानत पर रिहा करने से रोक दिया जाता है.”


कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी बनाम जाहूर अहमद शाह वटाली (2019) और अफजल खान बनाम गुजरात राज्य (2007) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया, जिसमें विशेष अधिनियमों के तहत गंभीर अपराधों में जमानत देने में अधिक सतर्कता बरतने की आवश्यकता पर बल दिया गया था. 


इसके अलावा, गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2024) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक आरोपी को जमानत देने से इनकार किया था, क्योंकि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया उसकी संलिप्तता का संकेत मिलता था.


हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में उपलब्ध सामग्री, जैसे संरक्षित गवाहों के बयान, आरोपियों के खुलासे पर बरामद सामग्री, और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य, यह दर्शाते हैं कि आरोपियों का प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन सीपीआई (माओवादी) के साथ संबंध था. 


इनका कथित तौर पर विस्फोटक सामग्री जैसे डेटोनेटर, तार, और अन्य समर्थन सामग्री प्रदान करने में योगदान था, साथ ही साजिश की बैठकों में भागीदारी भी थी.


इन तथ्यों के आधार पर, कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के आदेश को सही ठहराया और जमानत याचिका खारिज कर दी. 


कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी हिरासत या परिवार की निर्भरता जैसे सामाजिक-आर्थिक कारक राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को प्रभावित नहीं कर सकते. 


हालांकि, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मुकदमे की सुनवाई को तेजी से पूरा करे और संभवतः छह महीने के भीतर कार्यवाही समाप्त करे.


यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कड़े रुख को दर्शाता है और यह संदेश देता है कि आतंकवाद से संबंधित अपराधों में जमानत के लिये उच्च मानक अपनाये जायेंगे.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP