GPM जिले में प्रशासन ने रुकवाया 16 वर्षीय नाबालिग का बाल विवाह
पेन्ड्रा । डेस्क: छत्तीसगढ़ को बाल विवाह की कुप्रथा से मुक्त करने के अभियान के तहत गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में प्रशासन को एक और बड़ी सफलता मिली है. ताज़ा मामला लाटा गांव का है, जहाँ महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम ने ऐन वक्त पर पहुंचकर एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की का विवाह रुकवा दिया.
चाइल्ड हेल्पलाइन से मिली गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए विभाग के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर न केवल मंडप में होने वाली इस गैर-कानूनी रस्म को बंद कराया, बल्कि बालिका के सुनहरे भविष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित की.
मौके पर पहुंची टीम ने नाबालिग के परिजनों को कानून का पाठ पढ़ाते हुए समझाया कि कम उम्र में शादी करना न केवल बच्ची के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि यह कानूनन अपराध भी है. बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की गंभीरता को समझते हुए परिजनों ने अपनी गलती स्वीकार की और भविष्य में बिना उम्र पूरी हुए बेटी की शादी न करने के शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर किए.
जिला कार्यक्रम अधिकारी अमित सिन्हा के अनुसार, जिले में जागरूकता और सक्रियता का असर दिखने लगा है, जिसके परिणामस्वरुप पिछले मात्र दो महीनों के भीतर 13 बाल विवाह रोके जा चुके हैं. प्रशासन अब घर-घर जाकर इस सामाजिक बुराई के खिलाफ अलख जगा रहा है ताकि जिले की कोई भी बिटिया शिक्षा और विकास की राह से न भटके.
गौरतलब है कि भारत में बाल विवाह को रोकने के लिए मुख्य रूप से बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (The Prohibition of Child Marriage Act, 2006) प्रभावी है, जो 1 नवंबर 2007 से पूरे देश में लागू हुआ. इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जड़ से समाप्त करना और बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा के अधिकारों की रक्षा करना है.
इस अधिनियम के तहत विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है; यदि विवाह के समय दोनों में से कोई भी इस आयु सीमा से कम है, तो उसे 'बाल विवाह' माना जाता है. कानून के प्रावधानों के अनुसार, बाल विवाह करवाना, उसमें सहायता करना या उसे बढ़ावा देना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है.
यदि कोई वयस्क पुरुष किसी नाबालिग लड़की से विवाह करता है, या कोई व्यक्ति बाल विवाह संपन्न कराता है (जैसे पंडित, मौलवी या अन्य धार्मिक गुरु), या माता-पिता/अभिभावक इसे बढ़ावा देते हैं, तो उन्हें 2 साल तक के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है.
इसके अलावा, कानून पीड़ित को यह अधिकार देता है कि वह वयस्क होने के दो साल के भीतर (यानी 20 वर्ष की आयु तक) अपनी शादी को शून्य घोषित करने के लिए न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है. जिला स्तर पर इन मामलों की निगरानी और रोकथाम के लिए 'बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी' की नियुक्ति का प्रावधान भी है, जो सूचना मिलने पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं.