गौरेला: प्यास से जंग लड़ते बैगा आदिवासी, जल जीवन मिशन बना 'सफेद हाथी'
पेन्ड्रा । डेस्क: छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में भीषण गर्मी के बीच बैगा आदिवासी समुदाय पानी की एक-एक बूंद के लिए मौत से खेल रहा है. सरकार की महत्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' योजना, जिसे हर घर तक स्वच्छ पानी पहुंचाने के दावे के साथ शुरू किया गया था, इस आदिवासी बहुल इलाके में पूरी तरह जमींदोज नजर आ रही है. यहां लगे नल के कनेक्शन और ऊंचे ओवरहेड टैंक केवल 'सफेद हाथी' बनकर रह गए हैं, जो ग्रामीणों के लिए सरकारी तंत्र की विफलता का स्मारक मात्र हैं.
गौरेला ब्लॉक के पीपरखुंटी और बेडखोदरा जैसे गांवों में स्थिति इतनी भयावह है कि प्यास बुझाने के लिए ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर गहरे कुओं में उतरना पड़ रहा है.
पीपरखुंटी गांव, जहां लगभग 40 बैगा परिवार निवास करते हैं, वहां पानी का संकट किसी युद्ध से कम नहीं है. गांव के पुरुष और महिलाएं एक ही कुएं के चारों ओर घंटों घेरा डाले रहते हैं. जब कुएं का जलस्तर गिर जाता है, तो ग्रामीण सीढ़ी लगाकर नीचे उतरते हैं और कीचड़ युक्त मटमैले पानी को बूंद-बूंद करके बर्तनों में जमा करते हैं. इसके बाद रस्सी के सहारे उस मटमैले पानी को ऊपर खींचा जाता है.
गांव के निवासी बाबूलाल बैगा की व्यथा तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर करती है, जो बताते हैं कि वे वर्षों से दुर्गंधयुक्त और गंदा पानी छानकर पीने को मजबूर हैं क्योंकि उनके पास जीवित रहने का और कोई विकल्प नहीं बचा है. ग्रामीणों का कहना है कि नल तो चार साल पहले लग गए थे, लेकिन उनमें आज तक पानी की एक बूंद नहीं आई. विडंबना यह है कि जिस इकलौते कुएं पर पूरा गांव निर्भर है, वह भी जर्जर होकर ढहने की कगार पर है.
यही हाल करंगरा ग्राम पंचायत के बेडखोदरा गांव का है, जहां 'नल जल योजना' के तहत करोड़ों के टेंडर तो जारी हुए, लेकिन जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है. यहां पाइपलाइन बिछाने और टंकी बनाने का काम दो साल से अधूरा लटका है. ग्रामीणों ने पंचायत से लेकर जिले के आला अधिकारियों तक गुहार लगाई, लेकिन नतीजा सिफर रहा.
उपसरपंच देव प्रताप राजपूत स्वीकार करते हैं कि बोरवेल फेल होने और ठेकेदारों की लापरवाही की वजह से ग्रामीण संकट में हैं. आदिवासियों का आरोप है कि किसी भी अधिकारी ने आज तक गांव का दौरा कर उनकी सुध लेना जरूरी नहीं समझा.
गर्मी के मौसम में जब जलस्तर नीचे चला जाता है, तब यह संकट और भी गहरा हो जाता है, जिससे महिलाओं को मिलों पैदल चलकर दूषित पानी लाना पड़ता है.
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) की कार्यपालन अभियंता प्रिया सोनी ने इस पूरी अव्यवस्था का ठीकरा ठेकेदारों के सिर फोड़ दिया है. विभाग का कहना है कि लापरवाही बरतने वाले ठेकेदारों को नोटिस जारी किए गए हैं और काम पूरा न होने पर उनके अनुबंध समाप्त कर दिए जाएंगे.
हालांकि, विभाग के पास इस समस्या के तत्काल समाधान की कोई ठोस योजना नहीं दिखती. सरकारी अधिकारी अब भी 2027 के दूरगामी लक्ष्य की बात कर रहे हैं, जबकि बैगा आदिवासियों के लिए 2024 की यह तपती गर्मी गुजारना भी दूभर हो रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी यदि आदिवासियों को कीचड़ वाला पानी ही पीना है, तो इन भारी-भरकम योजनाओं का औचित्य क्या है? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है या फिर इन वंचित समुदायों की प्यास चुनावी वादों और कागजी आंकड़ों के बीच ही दम तोड़ती रहेगी?