बांग्लादेश में BNP की जीत: दक्षिण एशिया में बदलेंगे भारत-पाक-चीन के समीकरण
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश के संसदीय चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की ऐतिहासिक और प्रचंड जीत ने न केवल देश के भीतर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत की है, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में शक्ति संतुलन के पुनर्गठन का संकेत भी दे दिया है. चुनाव आयोग द्वारा शनिवार को आधिकारिक गजट जारी किए जाने के साथ ही तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी की सत्ता पर पकड़ पक्की हो गई है. प्रारंभिक परिणामों के अनुसार, बीएनपी और उसके सहयोगियों ने 299 में से 212 सीटों पर कब्जा जमाया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को 77 सीटें मिली हैं.
लगभग दो दशकों में देश के इस पहले वास्तविक प्रतिस्पर्धी चुनाव ने शेख हसीना के लंबे शासनकाल का अंत कर ढाका की विदेश नीति में एक बड़े 'पैराडाइम शिफ्ट' यानी वैचारिक बदलाव की जमीन तैयार कर दी है. जीत की घोषणा के तुरंत बाद भारत और पाकिस्तान दोनों के प्रधानमंत्रियों द्वारा 60 वर्षीय तारिक रहमान को दी गई बधाई इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय शक्तियां बांग्लादेश की इस नई हकीकत को स्वीकार कर चुकी हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव परिणाम भारत और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को गढ़ने में एक नया मोड़ साबित होगा. ढाका विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर देलवर होसैन के अनुसार, नई सरकार एक स्पष्ट नीतिगत ढांचे के साथ आएगी, हालांकि भारत-पाकिस्तान की पुरानी शत्रुता और चीन-भारत की प्रतिस्पर्धा बांग्लादेश की विदेश नीति के लिए निर्णायक कारक बनी रहेगी. भारत के लिए यह बदलाव विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर पोस्ट और फोन कॉल के माध्यम से रहमान को समर्थन का आश्वासन दिया, लेकिन नई दिल्ली और ढाका के बीच पिछले कुछ समय से तनाव स्पष्ट रहा है. 2024 के जनविद्रोह के बाद शेख हसीना का भारत में शरण लेना और बांग्लादेश के ट्रिब्यूनल द्वारा उन्हें सुनाई गई मौत की सजा के बावजूद भारत का उन्हें प्रत्यर्पित न करना, दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट की बड़ी वजह रहा है.
हालांकि, भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर का खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होना इस बात का संकेत था कि भारत नई राजनीतिक वास्तविकता के साथ तालमेल बिठाने के लिए तैयार है.
विश्लेषकों का तर्क है कि एक निर्वाचित सरकार होने के नाते बीएनपी के पास भारत के साथ कामकाजी संबंध बहाल करने के मजबूत कारण होंगे, लेकिन यह शेख हसीना के दौर जैसी राजनीतिक निकटता शायद ही दोबारा देखने को मिले. तीस्ता नदी जल विवाद, सीमा पर होने वाली गोलीबारी और बड़ा व्यापार घाटा ऐसे मुद्दे हैं जो संबंधों में खटास पैदा करते रहेंगे. इसके अलावा, बांग्लादेशी युवाओं में बढ़ती भारत विरोधी भावना भी तारिक रहमान की सरकार पर नई दिल्ली के प्रति कड़ा रुख अपनाने का दबाव बनाएगी.
दूसरी ओर, पाकिस्तान के लिए यह चुनाव एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है. अंतरिम सरकार के दौरान ही दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें शुरू हुईं और सैन्य सहयोग की चर्चाएं तेज हुईं. पाकिस्तानी राजनयिक सलमान बशीर का मानना है कि यह अवामी लीग के भारत के साथ 'लंबे गठबंधन' का अंत है और पाकिस्तान के साथ संबंधों को फिर से खोलने का समय है. विशेष रूप से पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश को जेएफ-17 लड़ाकू विमान बेचने की चर्चाएं और चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश के बीच संभावित रक्षा सहयोग भारत के क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है.
चीन की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है. बीजिंग ने हसीना के दौर में बुनियादी ढांचे और सैन्य क्षेत्र में भारी निवेश किया था और अब वह बीएनपी सरकार के साथ 'नया अध्याय' लिखने को तैयार है. बीएनपी का पिछला रिकॉर्ड भी चीन के प्रति मित्रवत रहा है.
हालांकि, बांग्लादेश को चीन की बढ़ती मौजूदगी पर अमेरिकी चिंताओं का भी सामना करना पड़ेगा. भू-राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ढाका के लिए सबसे व्यवहार्य रास्ता यह होगा कि वह चीनी निवेश को अपनी आर्थिक जरूरतों तक सीमित रखे और सुरक्षा के मोर्चे पर सावधानी बरते ताकि वह महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा न बने. तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल की खाड़ी में जारी महाशक्ति प्रतिस्पर्धा के बीच 'बांग्लादेश फर्स्ट' की नीति को बनाए रखने की होगी.
उनके चुनावी घोषणापत्र में राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है. आने वाले समय में ढाका को भारत, चीन, पाकिस्तान और अमेरिका के साथ अपने संबंधों में एक बेहद बारीक और व्यावहारिक संतुलन बनाना होगा.
यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीएनपी सरकार अपनी विदेश नीति में केवल बयानबाजी तक सीमित रहती है या वास्तव में दक्षिण एशिया में एक स्वतंत्र और स्वायत्त शक्ति के रूप में बांग्लादेश को स्थापित कर पाती है. कुल मिलाकर, यह जनादेश दक्षिण एशिया को एक ऐसी दिशा में ले जा रहा है जहां कोई भी देश अब किसी एक शक्ति का 'पिछवाड़ा' नहीं कहलाएगा, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन के नए केंद्र उभरेंगे.