बांग्लादेश में धर्म के नाम पर हिंसा, बर्बर और शर्मनाक- शेख हसीना
नई दिल्ली । डेस्क: बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले में कथित धर्म-अवमानना के आरोप में उन्मादी भीड़ द्वारा 27 वर्षीय हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या किए जाने की घटना ने देश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा को एक बार फिर उजागर कर दिया है. हत्या के बाद दीपू के शव को सार्वजनिक रूप से लटकाकर आग लगा दी गई. पुलिस जांच में बाद में स्पष्ट हुआ कि दीपू के खिलाफ धर्म-अवमानना का कोई प्रमाण नहीं मिला है. परिवार का आरोप है कि यह हत्या धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि कार्यस्थल की दुश्मनी के चलते की गई.
इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए बांग्लादेश की अपदस्थ और निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इसे “बर्बर और शर्मनाक” करार दिया. भारत में रह रहीं हसीना ने एक भारतीय समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा कि अंतरिम सरकार के शासन में देश में कानून-व्यवस्था और नैतिकता का खतरनाक पतन हो रहा है. उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर हिंसा की बांग्लादेश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसी घटनाएं अब लगातार हो रही हैं.
हसीना ने दावा किया कि बांग्लादेश अल्पसंख्यकों के लिए तेजी से असुरक्षित होता जा रहा है और राज्य अपने सभी नागरिकों को समान सुरक्षा देने की बुनियादी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक हिंसा के दोषियों को सजा नहीं मिल रही, जबकि अंतरिम सरकार उग्र इस्लामी तत्वों को नजरअंदाज कर रही है.
बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के अनुसार, केवल दिसंबर महीने में ही सांप्रदायिक हिंसा की 51 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 10 हत्याएं, लूटपाट, आगजनी, झूठे धर्म-अवमानना के आरोप, यौन हिंसा और शारीरिक हमले शामिल हैं. संगठन का आरोप है कि अल्पसंख्यक समुदायों के घरों, मंदिरों और व्यवसायों को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है.
हाल के सप्ताहों में हिंदुओं पर हमलों की घटनाएं और बढ़ी हैं. दुकानदार, मजदूर और महिलाओं को निशाना बनाकर की गई कई नृशंस घटनाओं ने देश की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. शेख हसीना ने चेतावनी दी कि यदि उग्रवाद को रोका नहीं गया, तो इसका असर न केवल सामाजिक ताने-बाने पर पड़ेगा, बल्कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय छवि भी प्रभावित होगी.