बांग्लादेश चुनाव: क्या बीएनपी जुलाई नेशनल चार्टर को लागू करेगी?
नई दिल्ली । डेस्क: बांग्लादेश के 13वें आम चुनावों के नतीजों ने न केवल सत्ता का रुख साफ कर दिया है, बल्कि देश के भविष्य के लिए एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है. चुनाव के साथ-साथ आयोजित हुए ऐतिहासिक जनमत संग्रह में 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने 'जुलाई नेशनल चार्टर' के पक्ष में 'हां' का वोट दिया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) इस सुधार चार्टर को पूरी तरह लागू करेगी या नहीं.
जुलाई नेशनल चार्टर दरअसल 2024 के छात्र-जन विद्रोह के बाद तैयार किया गया एक व्यापक संवैधानिक सुधार दस्तावेज है, जिसे अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने 'नए बांग्लादेश का जन्म' कहा था. इस चार्टर का मुख्य उद्देश्य सत्ता के केंद्रीकरण को रोकना और भविष्य में किसी भी 'निरंकुश' शासन की वापसी की संभावना को समाप्त करना है.
जुलाई नेशनल चार्टर की बात करें तो इसमें 80 से अधिक सुधार प्रस्ताव शामिल हैं. इसके तहत बांग्लादेश में एक 'उच्च सदन' बनाने का प्रस्ताव है, जिसमें 100 सदस्य होंगे और उनका आवंटन राजनीतिक दलों के वोट शेयर के आधार पर होगा. इसके अलावा, प्रधानमंत्री के कार्यकाल की अधिकतम सीमा दो बार तय करना, न्यायपालिका की पूर्ण स्वतंत्रता सुनिश्चित करना, और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया में आमूल-चूल बदलाव इसके प्रमुख बिंदु हैं.
चार्टर में यह भी प्रावधान है कि कोई एक व्यक्ति एक साथ प्रधानमंत्री, दल प्रमुख और सदन का नेता नहीं रह सकता. यह चार्टर 'बंगाली राष्ट्रवाद' और 'धर्मनिरपेक्षता' जैसे पुराने संवैधानिक सिद्धांतों के स्थान पर समानता, मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों को स्थापित करने की बात करता है.
इस महत्वपूर्ण सुधार दस्तावेज पर विजयी बीएनपी का रुख अब तक मिला-जुला और थोड़ा संशयपूर्ण रहा है.
चुनाव प्रचार के दौरान बीएनपी नेता तारिक रहमान ने जनमत संग्रह में 'हां' वोट देने का समर्थन किया था, लेकिन पार्टी के भीतर इस चार्टर के कुछ हिस्सों, विशेषकर 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व' और 'उच्च सदन' की संरचना को लेकर काफी असहमति रही है. बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने जीत के बाद संकेत दिया है कि पार्टी चार्टर के उन बिंदुओं को 'चरणबद्ध तरीके से' लागू करेगी जिन पर वह पहले ही हस्ताक्षर कर चुकी है.
हालांकि, जानकारों का मानना है कि बीएनपी को अब संसद में जो विशाल बहुमत (299 में से 209 सीटें) मिला है, उसके बाद वह अपनी शक्तियों को सीमित करने वाले कड़े संवैधानिक संशोधनों को लागू करने में देरी कर सकती है या उनमें बदलाव की कोशिश कर सकती है. बीएनपी का तर्क रहा है कि उच्च सदन और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसी व्यवस्थाएं बड़े संसदीय बहुमत के महत्व को कम कर सकती हैं.
इसी बीच, अवामी लीग की प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को लेकर बीएनपी का रुख बेहद सख्त बना हुआ है. पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह भारत में निर्वासन काट रहीं शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए औपचारिक रूप से दबाव बनाएगी. बीएनपी का कहना है कि 2024 के विद्रोह के दौरान हुई मौतों के लिए हसीना को बांग्लादेश की अदालत में मुकदमे का सामना करना चाहिए, जहाँ एक विशेष ट्रिब्यूनल ने उन्हें पहले ही मौत की सजा सुनाई है.
बीएनपी नेता सलाहुद्दीन अहमद ने जीत के बाद दोहराया कि भारत के साथ रिश्ते समानता और आपसी सम्मान पर आधारित होने चाहिए, लेकिन शेख हसीना का मुद्दा एक कानूनी और राष्ट्रीय गरिमा का विषय है जिसे छोड़ा नहीं जा सकता.
ऐसे में, आने वाले दिनों में बीएनपी के नेतृत्व वाली नई सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती होगी कि वह एक तरफ 'जुलाई नेशनल चार्टर' के लोकतांत्रिक वादों को पूरा करे और दूसरी तरफ शेख हसीना के प्रत्यर्पण जैसे संवेदनशील राजनीतिक और राजनयिक मुद्दों को सुलझाए.