बांग्लादेश चुनाव: तारीक रहमान की अग्निपरीक्षा
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में 12 फरवरी का आम चुनाव एक निर्णायक मोड़ साबित होने जा रहा है, जहाँ देश की सबसे पुरानी और प्रमुख पार्टियों में से एक, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के भविष्य का फैसला होना है. लगभग 17 साल के लंबे निर्वासन के बाद लंदन से लौटे तारीक रहमान के लिए यह चुनाव मात्र सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि उनकी अपनी नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक विरासत को साबित करने की एक कठिन अग्निपरीक्षा है.
पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन के बाद पार्टी की कमान संभालने वाले 60 वर्षीय रहमान ने दिसंबर में स्वदेश वापसी के साथ ही चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथों में ले ली थी. गाजीपुर जैसे औद्योगिक केंद्रों में आधी रात को उमड़ने वाली हजारों की भीड़ यह संकेत देती है कि शेख हसीना के 15 वर्षों के कड़े शासन के बावजूद बीएनपी का जमीनी आधार अब भी सुरक्षित है.
अवामी लीग पर लगे प्रतिबंध के बाद, बीएनपी इस दौड़ में सबसे आगे मानी जा रही है, लेकिन रहमान के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखने की है, क्योंकि लगभग 79 निर्वाचन क्षेत्रों में 90 से अधिक बागी उम्मीदवार पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों को चुनौती दे रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निर्वासन के दौरान रहमान ने जिस तरह से वर्चुअल माध्यम से पार्टी चलाई, वह जमीन पर वास्तविक संगठनात्मक नियंत्रण में पूरी तरह तब्दील नहीं हो पाई है.
चुनाव प्रचार के दौरान रहमान के भाषणों और वादों को लेकर भी कई सवाल खड़े हुए हैं. फरीदपुर में सोयाबीन उत्पादन के उनके दावे और 50 करोड़ पेड़ लगाने जैसे बड़े वादों को विशेषज्ञों ने 'तैयारी की कमी' करार दिया है. आलोचकों का कहना है कि 17 साल देश से बाहर रहने के कारण वह बांग्लादेश की बदली हुई वास्तविकताओं और आर्थिक चुनौतियों से पूरी तरह अवगत नहीं हैं. विशेष रूप से युवाओं के बीच उनकी छवि को लेकर संशय बना हुआ है.
18 से 26 वर्ष के मतदाता, जिन्होंने कभी बीएनपी का शासन नहीं देखा, उनके मन में पार्टी को लेकर भ्रष्टाचार और जबरन वसूली की पुरानी धारणाएं घर कर गई हैं. हालांकि रहमान ने अपने टीवी संबोधन में अतीत की गलतियों के लिए माफी मांगते हुए एक पारदर्शी और जवाबदेह सरकार बनाने का वादा किया है, लेकिन 23 ऋण डिफॉल्टरों को टिकट देने जैसे फैसलों ने उनके भ्रष्टाचार विरोधी दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं.
इसके साथ ही, पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि रहमान ने योग्यता के बजाय वफादारी को प्राथमिकता दी है, जिससे उन स्थानीय नेताओं में असंतोष है जिन्होंने हसीना सरकार के दमनकारी दौर में जमीन पर रहकर संघर्ष किया था.
रहमान के लिए एक और बड़ी चुनौती जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) का गठबंधन है, जो बीएनपी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहे हैं. 2024 के छात्र आंदोलन से उपजी नई राजनीतिक चेतना ने बांग्लादेश के चुनावी समीकरणों को जटिल बना दिया है. विश्लेषक मानते हैं कि यदि रहमान इस चुनाव में भारी बहुमत से जीत दर्ज करते हैं, तभी वह अपनी मां खालिदा जिया और पिता जनरल जियाउर रहमान की छाया से बाहर निकलकर खुद को एक स्वतंत्र और सक्षम नेता के रूप में स्थापित कर पाएंगे.
उनकी वापसी ने कार्यकर्ताओं में जोश तो भरा है, लेकिन क्या यह उत्साह वोट में बदल पाएगा, यह देखना बाकी है. बांग्लादेश की जनता अब केवल राजनीतिक उत्तराधिकार नहीं, बल्कि शासन में बदलाव और आर्थिक स्थिरता की तलाश में है.
तारीक रहमान का यह सफर निर्वासन की गुमनामी से निकलकर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने का है, लेकिन उनके रास्ते में आंतरिक गुटबाजी, प्रशासनिक अनुभव की कमी और बदलती जन-आकांक्षाओं की दीवारें खड़ी हैं. गुरुवार को होने वाला मतदान न केवल बीएनपी के भाग्य का फैसला करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि बांग्लादेश की राजनीति में 'रहमान युग' की शुरुआत होगी या देश किसी नए विकल्प की ओर कदम बढ़ाएगा.