एस्ट्रीड बर्गमैन सुक्सोडर्फ-एक जंगल, एक पहाड़, एक शेर, एक बच्चा और एक दिल
एस्ट्रीड बर्गमैन सुक्सोडर्फ-एक जंगल, एक पहाड़, एक शेर, एक बच्चा और एक दिल और एक चेंदरू की कहानी
कहानी एस्ट्रीड बर्गमैन सुक्सोडर्फ की
केवल कृष्ण | रायपुर : पता नहीं क्यों, चेंदरू एक बार फिर चर्चा में है. एक बार फिर उस पर लेख लिखे जा रहे हैं, डाक्यूमेंटरी बनाई जा रही है, लोग याद कर रहे हैं कि चेंदरू ने किस तरह अपनी शोहरत को ठोकर मारकर खुद को अपनी माटी में विलीन कर दिया, मंत्री-संत्री चेंदरू के किस्से सुना रहे हैं. एक बार फिर चेंदरू के चाहने वालों को अच्छा लग रहा है, बहुत अच्छा लग रहा है.
चेंदरू की मौत के बाद गाहे-बगाहे उसकी स्मृतियों का ऐसा उत्सव मनाया जाता रहा है, उसकी स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाए रखने की कोशिशें होती रहीं हैं. चेंदरू की स्मृतियों ने अब गहरी जड़ें भी जमा ली हैं.
17 जनवरी 1999 को एक अखबार ने एक न्यूज फीचर छापा था- "एक टार्जन की कहानी." इसके बाद ही आमो-खास ने चेंदरू को जाना था. पहली बार लोगों ने उन रंगीन तस्वीरों को देखा था, जिनमें एक नन्हें बालक और एक शेर की दोस्तों की सच्ची कहानियां थीं. इन तस्वीरों को देखकर लोग अवाक् रह गए थे. आज भी जब ये तस्वीरें यहां-वहां छपती हैं, लोगों को मुग्ध कर देती हैं.
ये तस्वीरें चेंदरू की जैसी मोहक कहानी सुनाती हैं, वैसी ही मोहक कहानी इन्हें कैप्चर करने वाली फोटोग्राफर एस्ट्रीड की भी है. लोग इन तस्वीरों में इतने गुम हो जाते हैं कि अक्सर इस फोटोग्राफर के बारे में सोचना ही भूल जाते हैं. तस्वीरों को छापते हुए अखबार क्रेडिट देना भूल जाते हैं, या यह पता लगाने की कोशिश ही नहीं करते कि तस्वीरें किसने उतारी थीं.

ये तस्वीरें पहली बार एक रंगीन किताब "चेन्दरू- द ब्वाय एंड द टाइगर" में प्रकाशित हुई थीं. 1960 में छपी यह किताब भी 1999 में पहली बार भारत में चर्चा में आई थी, जब लोगों ने "एक टार्जन की कहानी" में, अखबार के रंगीन पन्ने पर, इन्हें छपे देखा था. खुद को माटी में विलीन कर देने वाला चेंदरू एस्ट्रीड से तोहफे में मिली किताब को अपने सीने से अलग नहीं कर पाया था. अपने प्रकाशन के दशकों बाद तक वह किताब चेंदरू की झोपड़ी की एक अंधेरी खोली में, टूटे-फूटे टीन के संदूक में, जीर्ण-शीर्ण पड़ी रह गई थी.
एस्ट्रीड, प्रसिद्ध फिल्मकार अर्न सुक्सोडर्फ की पत्नी थीं, उनके सपनों की साझेदार, उनकी रचनात्मकता की साझेदार, उनके विचारों की साझेदार, उनकी सहयात्री, उनकी सखी. दोनों की साझेदारी से ही वह फिल्म बनी थी, जिसने कान फेस्टिवल में प्रदर्शित होने के बाद दुनिया भर में धूम मचा दी थी- "द जंगल सागा."
इसी फिल्म को हम उसके अंग्रेजी संस्करण "द फ्लूट एंड द एरो" के नाम से भी जानते हैं. दुनिया की अनेक भाषाओं में यह फिल्म अनेक नामों से जानी जाती है. यह वह फिल्म थी, जिसे देखकर दुनिया बस्तर के सौंदर्य और उसकी संस्कृति से चमत्कृत थी. एस्ट्रीड इस फिल्म की सह निर्माता थी, साथ ही फोटोग्राफर भी. इस फिल्म में दुनिया ने देखा कि मनुष्य और वन्य-प्राणी जब साथ मिलकर जीते हैं, तब यह धरती कितनी खूबसूरत हो जाती है.
एस्ट्रीड जंगलों से प्रेम करती थी, वन्य प्राणियों से प्रेम करती थी, बच्चों से प्रेम करती थी. चाहे ये जंगल, वन्य-प्राणी और बच्चे इस पृथ्वी के किसी भी भूगोल के हों. "द जंगल सागा" उनके इसी व्यापक प्रेम का प्रतिबिंब है. किताब "चेंदरू-द ब्वाय एंड द टाइगर" एस्ट्रीड के हृदय का रंगीन एलबम है. उनका यह प्रेम इतना अधिक है कि जब एस्ट्रीड तस्वीरों से बयां कर नहीं छकीं तो उन्होने कलम उठा ली, लिखने लगीं- सुदूर मध्यभारत के जंगलों में...
एस्ट्रीड बेहतरीन फोटोग्राफर होने के साथ-साथ लेखिका भी थीं. एस्ट्रीड मारिया एलीजाबेट बर्गमैन सुक्सोडर्फ यह उनका पूरा नाम था. 1927 में उनका जन्म स्वीडन के स्टॉकहोम में हुआ था. उनके पिता स्टेन बर्गमैन जाने-माने जीवविज्ञानी और शोधकर्ता थे, जिनके प्रभाव से एस्ट्रिड में बचपन से ही प्रकृति, जानवरों और यात्राओं के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई. उन्होंने फोटोग्राफर अर्ने वालबर्ग से प्रशिक्षण लिया, जहाँ उन्होंने एयरब्रशिंग, व्यावसायिक फोटोग्राफी और रंगीन प्रिंटिंग जैसी तकनीकें सीखीं. बाद में वे विभिन्न अखबारों की संवाददाता बनीं और दुनिया भर में लगभग पचास रोमांचक यात्राएँ कीं.
एस्ट्रिड ने पहले फोटोग्राफर स्वेन गिल्सेटर से विवाह किया, जो टियो फोटोग्राफर नामक प्रसिद्ध समूह के सदस्य थे. दोनों की एक बेटी हुई, जिसका नाम पिया था. इसके बाद उन्होंने फिल्म निर्देशक अर्ने सक्सडॉर्फ के साथ जीवन बिताया. दोनों ने कई परियोजनाओं पर साथ काम किया और कई देशों की यात्राएँ कीं. उनसे एस्ट्रिड का एक बेटा, जेंस हुआ. बाद के वर्षों में वे अपने तीसरे पति ग्योस्ता वोगेल-रोडिन के साथ लुलेओ के डेमंस गॉर्ड में रहीं, जहाँ उन्होंने लेखन और फोटोग्राफी में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया.
दस्तावेज़ बताते हैं कि 1949 में एस्ट्रिड ने स्टॉकहोम में आयोजित प्रदर्शनी उंगा फोटोग्राफर यानी युवा फोटोग्राफर में हिस्सा लिया. यह प्रदर्शन स्वीडिश फोटोग्राफी के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने युवा फोटोग्राफरों को नई पहचान दिलाई. इसमें ग्यारह युवा फोटोग्राफरों के काम प्रदर्शित किए गए थे और इसकी पहल ‘फोटो’ पत्रिका के संपादक लार्स विकमैन ने की थी. उस समय फोटोग्राफी का क्षेत्र पुरुष प्रधान था, और एस्ट्रिड उनमें से कुछ चुनिंदा महिला फोटोग्राफरों में थीं, जिन्होंने स्थापित परंपराओं को चुनौती दी. प्रदर्शनी में स्युर्रियलिज़्म से प्रेरित तस्वीरें, गहरे ब्लैक-एंड-व्हाइट शॉट्स, अमूर्त रचनाएँ और समाचार आधारित दृश्य शामिल थे. इसे आलोचकों ने सराहा और इसे स्वीडिश फोटोग्राफी में एक नए दौर की शुरुआत माना गया.
1953 में एस्ट्रिड की पहली पुस्तक मिक्की रैवुंगन प्रकाशित हुई, जिसमें एक छोटे लोमड़ी शावक की एक गर्मी के दिन की रोमांचक कहानी को श्वेत-श्याम तस्वीरों के माध्यम से बताया गया. इसके बाद उन्होंने बस्तर में फिल्म निर्माण के बाद, 1959 में 'चेंद्रु फार एन टाइगर' प्रकाशित की, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद लोकप्रिय हुई और कई भाषाओं में अनुवादित हुई.
उन्होंने अपने पति अर्न सुक्सोडर्फ के साथ मिलकर अनेक डाक्यूमेंटरी, पर्यावरण और बाल परियोजनाओं पर काम किया. उन्हें फोटोग्राफी के माध्यम से प्रकृति, वन्य जीवन और आदिवासी जनजीवन के दस्तावेजीकरण के लिए विश्वस्तर पर प्रसिद्धि मिली. एस्ट्रीड फोटोग्राफर भर नहीं थी, बल्कि उनका जीवन प्रकृति और मानव जीवन के बीच सेतु निर्माण की एक मुहिम था.

स्ट्रीड और अर्न सुक्सोडर्फ किसी फिल्म निर्माण की मंशा को लेकर बस्तर नहीं आए थे. वे तो बस्तर की प्रकृति और संस्कृति के उस सौंदर्य को अपनी आंखों के निहारना चाहते थे, जिसका वर्णन वैरियर एल्वीन जैसे विद्वानों ने अपनी किताबों में किया था. लेकिन अबुझमाढ़, चेंदरू और प्रेम से लबालब आदिवासी जीवन ने पति-पत्नी को मोह लिया. उनकी विधाओं ने उन्हें वह करने को प्रेरित किया, जो इतिहास बन गया. इस तरह "द जंगल सागा" और "चेंदरू- द ब्वाय एंड द टाइगर" का जन्म हुआ. ये परियोजनाएं उनके दिलों से निकली थीं. यह एस्ट्रीड का ममत्व ही था कि उन्होंने चेंदरू और अबुझमाढ़ के आदिवासी समुदायों के साथ इतनी आत्मीयता से संवाद किया कि पति-पत्नी, उनकी फिल्म और किताब बस्तर के साथ एकरस हो गए.
एस्ट्रीड के बारे में विवरण मिलता है कि उन्होंने भारत के साथ-साथ दुनिया के विभिन्न कोनों में महत्वपूर्ण परियोजनाओं में काम किया. उन्होंने स्वीडन और आर्कटिक क्षेत्र के बर्फिले जंगलों और वहां के आदिवासी समुदायों पर भी फोटो सीरीज एवं डाक्यूमेंटरी बनाई. यह भी 50-60 के दशक की ही बात है. वर्ष 1973 में उन्होंने टाइगर इन साइट (Tiger in Sight) किताब में वन्य प्राणियों और प्रवासी पक्षियों पर काम किया. 1960 में उनकी किताब "चेंदरू- द ब्वाय एंड द टाइगर" Harcourt, Brace and World (New yark) और Collins (London) से प्रकाशित हुई. उनका यह कार्य मानवशास्त्र का दस्तावेज माना जाता है.
हैरानी इस बात की होती है कि तकनीक की दृष्टि से फोटोग्राफी के उस चुनौतीपूर्ण दौर में एस्ट्रीड ने ध्रुवीय और बर्फीले क्षेत्रों में लाइट एण्ड शैडो को जितनी कुशलता से पकड़ा, उतनी ही कुशलता से मध्य भारत के उष्ण कटिबंधीय जंगलों में भी कैप्चर किया. उनके सामने तकनीकी चुनौतियों के साथ-साथ भीषण भौगोलिक चुनौतियां भी रही होंगी. भारत के महानगरों में बस्तर, खासकर अबुझमाड़ को आज भी दुरुह माना जाता है. 60 के दशक में इस युवा फोटोग्राफर ने स्वीडन में तय किया कि बस्तर जाकर उसके सौंदर्य को निहारना चाहिए.
1999 तक चेंदरू लोक की विस्मृतियों में रहा, गुमशुदा. एस्ट्रीड तो आज तक हैं. प्रसंगवश उनका उल्लेख यहां-वहां अवश्य हुआ, लेकिन लोगों ने उनके जीवन में, उनके हृदय में झांककर नहीं देखा. वहां भी एक खूबसूरत जंगल है, पहाड़ है, शेर है, एक बच्चा है, नहीं देखा.
समय, भाषा और भूगोल से रिसती एस्ट्रीड
नारायणपुर निवासी शिव कुमार पांडेय की किताब "बस्तर टाइगर : चेंदरू" में एस्ट्रीड के व्यक्तित्व और काम करने के तरीके की झलक मिलती है. श्री पांडेय ने किताब लेखन के दौरान गढ़बेंगाल के अनेक ऐसे लोगों से मुलाकात कीं, जिन्होंने "द जंगल सागा" की शूटिंग को प्रत्यक्ष देखा अथवा स्वयं उसका हिस्सा बने. पुस्तक 2020 में प्रकाशित हुई, सौभाग्य से श्री पांडेय फिल्म निर्माण के अरसे बाद भी एस्ट्रीड, अर्न सुक्सोडर्फ और द जंगल सागा से जुड़ी बेशकीमती यादों को कलमबद्ध करने में कामयाब रहे.

गढ़बेंगाल के इन्हीं पुराने लोगों की यादों को समेटते हुए यह किताब बताती है- "...कुछ लोगों से बात करते हुए एस्ट्रीड आई और उसने चारों तरफ देखा, जैसे सारे काम का जायजा ले रही हों, उन्होंने नर्तकों के परिधान के विषय में कहा, सब अपने तरह से कपड़े पहनेंगे. किसी को स्पेशल पहनने की जरूरत नहीं है."
श्री पांडेय लिखते हैं कि चीते (संभवतः तेंदुए) के पिल्ले (शावक) को लेकर एस्ट्रीड ज्यादा उत्साहित थीं. गढ़बेंगाल में उनके पति अध्ययन में व्यस्त हो जाते और वह, चेंदरू तथा तेंदूए का शावक, तीनों खेला करते थे.
चेंदरु की कहानी के शुरुआती कवरेज में फिल्म में इस्तेमाल किए गए जानवरो को लेकर बहुत अस्पष्टता रही, समय के साथ-साथ कहानी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती गई, नयी परतें खुलती गई्. बाद के दौर में स्पष्ट हुआ कि फिल्म में चेंदरू के दोस्त शेर तंबू के साथ-साथ एक और भी शेर था, बड़ा शेर. एक तेंदुआ था, शावक. इनके अलावा और भी वन्य पशु. चेंदरू का दोस्त तंबू और तेंदुए का यह शावक स्थानीय थे, अन्य पशुओं को बाहर से भी मंगवाया गया था, संभवतः कोलकाता से.
चेंदरू और एस्ट्रीड के बीच उतनी ही बढ़िया केमेस्ट्री थी, जितनी कि चेंदरू और शावकों के बीच, या फिर एस्ड्रीड और शावकों के बीच, या यों कहें कि उन सभी के बीच.
फिल्म के प्रदर्शन के बाद अर्न सुक्सोडर्फ और एस्ट्रीड चेंदरू को स्वीडन लेकर गये थे. विवरणों से पता चलता है कि चेंदरू करीब एक साल तक उनके साथ रहा. इस फिल्म के अनेक संस्करण अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग देशों में प्रदर्शित हुए. चेंदरू की दुनियाभर में धूम मच गई. इधर एस्ट्रीड चेंदरू पर अपनी ममता लुटाती रहीं. उनकी अपनी बेटियां भी थीं, पुरानी तस्वीरें बतातीं हैं कि एस्ट्रीड ने ममता लुटाने में अपनी बेटियों और चेंदरू में भेद नहीं किया.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एस्ट्रिड ने बच्चों के लिए फोटोग्राफिक चित्र पुस्तकों की रचना पर ध्यान केंद्रित किया था, जो जीवन के अंतिम समय तक जारी रहा. यह उस दौर में विकसित हो रही नई विधा थी, जिसके माध्यम से बच्चों को दुनिया भर के जीवन, प्रकृति और संस्कृति से परिचित कराया जाता था. इस क्षेत्र में अन्ना रिवकिन-ब्रिक के साथ एस्ट्रिड बर्गमैन सक्सडॉर्फ सबसे प्रमुख नामों में गिनी जाती हैं. उन्होंने अपने जीवन में कुल 20 पुस्तकें प्रकाशित कीं और बच्चों के साहित्य में योगदान के लिए 1984 में उन्हें आस्ट्रिड लिंडग्रेन पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
1997 में उन्होंने अपनी आत्मकथा मेद लीवेट ई फोकस प्रकाशित की. जीवन के अंतिम वर्षों में वे स्कारा में रहीं. 2015 में उनके निधन के बाद उनका पूरा रचनात्मक अभिलेख लैंडस्क्रोना म्यूज़ियम के संरक्षण में रखा गया. उसी वर्ष, 2015 में स्कारा में उनका निधन हुआ.
ये कहानियां भारतीय मीडिया में बहुत धीरे-धीरे उतरती रहीं. कुछ कच्ची, कुछ पक्की. चेंदरू की कहानी का एक हिस्सा अब तक इसलिए भी अधपका रह गया, क्योंकि एस्ट्रीड और चेंदरू का समय, भूगोल तथा भाषा आड़े रही. एस्ट्रीड ने जो कुछ लिखा और स्वीडन में तब जो कुछ छपा वह स्वीडिश में था. यहां तक कि 1997 में प्रकाशित एस्ट्रीड की आत्मकथा Med livet i focus भी. इसका आज तक अनुवाद नहीं हो पाया. इंटरनेट का दौर शुरु होने के बाद अंग्रेजी और थोड़ा-बहुत भारतीय भाषाओं में यहां-वहां बिखरी पड़ी सामग्री की कंपाइलिंग शुरु हो सकी.
इन्हीं सब से यह भी पता चलता है कि एस्ट्रीड का मन था कि चेंदरू को गोद ले लिया जाए, लेकिन इसी दौरान पति-पत्नी की अनबन शुरू हो गई. उन्होंने अपनी इस अनबन को चेंदरू पर जाहिर नहीं होने दिया. बिखरते घर में चेंदरू के जीवन में भी बिखराव के खतरे को भांपते हुए उन्होंने चेंदरू को वापस गढ़बेंगाल पहुंचाने का निर्णय लिया, उसके अपने परिवेश में. अर्न सुक्सोडर्फ चेंदरू को उसके घर पहुंचाने खुद भारत आए. तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर नेहरू से चेंदरू की मुलाकात की कहानी इसी समय की है.
जिस बिखराव से बचाने के लिए चेंदरू को गढ़बेंगाल वापस पहुंचाया गया, वह शायद चेंदरू की किस्मत में लिखा ही था. बताते हैं कि वापस लौटकर चेंदरू गुमसुम रहने लगा, उसने अपना दुःख जीवनभर किसी को नहीं बताया. यह दुःख शेर और तेंदूए के शावकों से बिछोह का था, या फिर एस्ड्रीड के दुलार भरे स्पर्श से वंचित हो जाने का, भगवान जाने.
*लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और 1999 में उन्होंने ही गुमनामी में खोये चेंदरू की कहानी सामने लाई थी.