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धर्म परिवर्तन करने वालों को ST सूची से हटाएं- नेताम

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07 जून 2025, 03:08 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

Arvind Netam
Arvind Netam

रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने अनुसूचित जनजाति के उन लोगों को सूची से हटाने की मांग का समर्थन किया है, जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है. शनिवार को रायपुर में पत्रकारों से बातचीत में पूर्व कांग्रेस नेता, जो अब सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके हैं, ने कहा कि उनकी इस मुद्दे पर राय बदल गई है, क्योंकि यह धार्मिक परिवर्तन को रोकने में मदद करता है.


यह बयान उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर में आयोजित 25 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग - द्वितीय’ के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के दो दिन बाद दिया.

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नेताम ने कहा, “आरएसएस की डीलिस्टिंग नीति पर शुरुआत में मैं इसका विरोध करता था, लेकिन बाद में मुझे लगा कि यह धार्मिक परिवर्तन को रोकने का एक तरीका है. इसलिये, मैंने उनकी इस नीति से सहमति जताई.” डीलिस्टिंग का अर्थ है उन आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाना, जिन्होंने ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लिया है. इस विचार के शुरुआती समर्थकों में स्वतंत्र भारत में पूर्व कांग्रेस सांसद स्वर्गीय कार्तिक ओरांव थे, जिन्होंने 1968 में संसद में एक विधेयक पेश कर ईसाई आदिवासियों को सूची से हटाने की असफल कोशिश की थी. हाल के वर्षों में, छत्तीसगढ़ के सरगुजा और बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में संघ परिवार से जुड़े विभिन्न समूहों ने इस मांग को जोर-शोर से उठाया है.


जब नेताम से पूछा गया कि उन्होंने अपनी राय क्यों बदली और पहले वह इस विचार के खिलाफ क्यों थे, तो उन्होंने बताया कि उनकी चिंता आरक्षित सीटों की संख्या को लेकर थी. छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में 29 सीटें आदिवासियों के लिये आरक्षित हैं. नेताम ने कहा, “मुझे डर था कि डीलिस्टिंग से आरक्षित सीटों की संख्या कम हो सकती है. लेकिन अध्ययन के बाद मैंने पाया कि छत्तीसगढ़ में केवल एक या दो सीटें ही प्रभावित होंगी.”


डीलिस्टिंग की मांग मुख्य रूप से नौकरियों, शिक्षा और पदोन्नति में आरक्षण के इर्द-गिर्द है, जो भारत का संविधान अनुसूचित जनजातियों के लिए सुनिश्चित करता है. हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि इसके प्रभाव आरक्षण से कहीं आगे जा सकते हैं. डीलिस्टिंग का असर भूमि सुरक्षा, अत्याचार और उत्पीड़न से संबंधित मामलों पर भी पड़ सकता है.


नेताम ने यह भी कहा कि डीलिस्टिंग का प्रभाव पूर्वोत्तर के ईसाई-बहुल क्षेत्रों में कम होगा, जहां अधिकांश आबादी आदिवासी है, जबकि छत्तीसगढ़ जैसे मिश्रित जनसंख्या वाले क्षेत्रों में इसका असर अधिक हो सकता है. यह मुद्दा आदिवासी समुदायों और धार्मिक परिवर्तन को लेकर चल रही बहस को और गहरा करता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP