अडाणी बाहर, चीनी कंपनी संभालेगी केन्या का नैरोबी एयरपोर्ट
नई दिल्ली । डेस्क: अफ्रीकी देश केन्या से भारतीय उद्योग जगत और अडाणी समूह के लिए एक बड़ा झटका देने वाली खबर सामने आई है. नैरोबी के प्रसिद्ध जोमो केन्याटा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (जेकेआईए) के आधुनिकीकरण और विस्तार का काम आखिरकार चीन की एक सरकारी कंपनी को सौंप दिया गया है. पहले इस परियोजना के लिए भारतीय दिग्गज अडाणी समूह के साथ बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी थी, लेकिन घरेलू विरोध और अदालती दखल के बाद केन्या सरकार ने दो साल पुरानी इस कवायद को पूरी तरह रद्द कर दिया.
अब इस महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजना के लिए नैरोबी ने बीजिंग के साथ करोड़ों डॉलर का सौदा किया है, जिसे लेकर वैश्विक विश्लेषक कई तरह के सवाल उठा रहे हैं.
बीजिंग के चक्रव्यूह में फंसा नैरोबी
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि केन्या को चीन के साथ इस नए समझौते के लिए बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. सूत्रों के मुताबिक, अडाणी समूह ने इसी हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण, अतिरिक्त रनवे के निर्माण और परिचालन को लाभदायक बनाने के लिए लगभग 200 करोड़ डॉलर का प्रस्ताव दिया था. इसके विपरीत, केन्याई सरकार ने अब उसी काम के लिए चीनी सरकारी कंपनी 'चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी' (सीसीसीसी) के साथ 290 करोड़ डॉलर का करार किया है.
जानकारों का कहना है कि चीन संकट का फायदा उठाकर अफ्रीकी देशों से मनमानी कीमत वसूल रहा है, जिससे आने वाले दिनों में केन्याई अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ना तय है.
जोमो केन्याटा हवाई अड्डे का संकट और २० साल का चीनी ठेका
नैरोबी का जोमो केन्याटा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पूर्वी अफ्रीका के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण विमानन केंद्रों में से एक है. वर्तमान में यह हवाई अड्डा अपनी तय क्षमता से कहीं अधिक यात्रियों का भार संभाल रहा है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस हवाई अड्डे की अधिकतम क्षमता 75 लाख यात्रियों की है, लेकिन वर्ष 2025 में यहां से यात्रा करने वालों की संख्या बढ़कर 90 लाख तक पहुंच गई.
इसी दबाव को कम करने के लिए राष्ट्रपति विलियम रूटो की सरकार ने इसके विस्तार को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा कोष से धन जारी करने की अनुमति दी. नए समझौते के तहत चीनी कंपनी सीसीसीसी अगले 20 वर्षों यानी 2045 तक रनवे, पैसेंजर टर्मिनल, विमान पार्किंग हैंगर और एयरपोर्ट कनेक्टिविटी सड़कों का निर्माण और रखरखाव करेगी.
अडाणी के खिलाफ केन्या में क्यों हुआ था विद्रोह
साल 2024 में जब अडाणी एयरपोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड ने इस हवाई अड्डे के अधिग्रहण और विकास के लिए करीब 15,526 करोड़ रुपये का निवेश करने की इच्छा जताई थी, तब केन्या में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया था. 'केन्या एविएशन वर्कर्स यूनियन' के नेतृत्व में हवाई अड्डा कर्मचारियों ने बड़े पैमाने पर हड़ताल कर दी थी. प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का आरोप था कि सरकार देश की इस महत्वपूर्ण संपत्ति का निजीकरण कर रही है, जिससे स्थानीय लोगों की नौकरियां छिन जाएंगी और विदेशी कामगारों को मौका मिलेगा.
हालांकि प्रशासन ने सफाई दी थी कि हवाई अड्डे को बेचा नहीं जा रहा है, बल्कि इसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर चलाया जाएगा, लेकिन विरोध प्रदर्शनों के उग्र होने के बाद स्थानीय अदालत ने अडाणी के साथ समझौते पर अस्थायी रोक लगा दी थी, जिससे यह सौदा पूरी तरह खटाई में पड़ गया.
कर्ज के जाल और चीन की कथित साजिश पर उठते सवाल
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का दावा है कि चीन ने केन्या को अपनी 'कर्ज जाल नीति' (डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी) में फंसा लिया है. अनुमानों के मुताबिक केन्या पर चीन का कर्ज 50 हजार करोड़ डॉलर या उससे भी अधिक हो सकता है, जिसे चुकाने के लिए नैरोबी को बार-बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की शरण लेनी पड़ रही है.
इस बीच, विश्लेषकों का यह भी मानना है कि चीन अफ्रीका में भारतीय कंपनियों के बढ़ते प्रभाव को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है. अडाणी समूह के साथ बातचीत के दौरान केन्याई विमानन कर्मचारियों के अचानक भड़के विरोध प्रदर्शन के पीछे भी बीजिंग की सोची-समझी साजिश की आशंका जताई जा रही है.
श्रीलंका और पाकिस्तान के हश्र से सबक नहीं
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारी कर्ज और ऊंची ब्याज दरों पर चीनी कंपनियों को ठेके देकर केन्या भी श्रीलंका और पाकिस्तान जैसी गलती दोहरा रहा है. साल 2009 में श्रीलंका ने चीनी बैंकों से भारी कर्ज लेकर हंबनटोटा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण किया था, जो बाद में पूरी तरह घाटे में चला गया और देश दिवालिया हो गया.
इसी तरह नेपाल का पोखरा हवाई अड्डा और पाकिस्तान के बलूचिस्तान में बना ग्वादर हवाई अड्डा भी चीनी कर्ज के जाल के कारण सफेद हाथी साबित हो रहे हैं.
केन्या के इस फैसले के बाद भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पहले ही सोशल मीडिया पर आगाह किया था कि अडाणी के खिलाफ नैरोबी का आंदोलन भारत विरोधी भावना में बदल सकता है, जिसके बाद अब नई दिल्ली की सतर्कता और रणनीतिक कदमों पर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं.