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100 मरीज, 5 मौतें: टीबी से जूझ रहा है छत्तीसगढ़

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14 जून 2026, 01:19 PM 6 मिनट में पढ़ें 3

टीबी, छत्तीसगढ़
टीबी, छत्तीसगढ़

आयुषी शर्मा | रायपुर : छत्तीसगढ़ के बीजापुर के कुटरू की कक्षा पांचवी में पढ़ने वाली संगीता सोरी की मौत टीबी से हो गई. उसके पिता लखमा सोरी अपनी बेटी की मौत के सदमे से उबर नहीं पाए हैं. उन्हें लगता है कि उनकी बेटी कुटरु के पोटाकेबिन छात्रावास में रह कर पढ़ती थी और उसे वहां समय पर ठीक उपचार नहीं मिल पाया.


पार्वती अकेली नहीं है, जिसकी टीबी से मौत हुई हो. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में टीबी के दर्ज प्रति 100 मरीजों में से कम से कम 5 लोगों की मौत हो जाती है. पूरे देश में टीबी मरीजों की मौत के सबसे खराब आंकड़ों वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ भी शुमार है.

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केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में टीबी मरीजों की मृत्यु दर 2022 में 5.7 प्रतिशत, 2023 में 5.4 प्रतिशत और 2024 में 5.2 प्रतिशत रही. यानी लगातार तीन वर्षों से राज्य में इलाज के लिए दर्ज हर 100 टीबी मरीजों में कम से कम पांच लोगों की मौत हो रही है.


चिंता की बात यह है कि यह दर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों से भी अधिक है. 2024 में मध्य प्रदेश में यह दर 3.9 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 3.2 प्रतिशत और बिहार में 2.7 प्रतिशत दर्ज की गई. विशेषज्ञों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से भी काफी ऊपर बनी हुई है, जो राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती का संकेत है.


सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में छत्तीसगढ़ में 39,593 टीबी मरीज दर्ज हुए और मृत्यु दर 5.2 प्रतिशत रही. इसका मतलब है कि पिछले वर्ष राज्य में इलाज के लिए दर्ज हुए मरीजों में से करीब 2,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई. दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य में औसतन हर दिन पांच से छह टीबी मरीज अपनी जान गंवा रहे हैं.


सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों से छत्तीसगढ़ की स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है.


चिंताजनक आंकड़े


टीबी यानी तपेदिक को लंबे समय से गरीबी, कुपोषण और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है. छत्तीसगढ़ में ये तीनों स्थितियां बड़ी संख्या में मौजूद हैं, खासकर आदिवासी और दूरस्थ इलाकों में. यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य में टीबी का वास्तविक बोझ सरकारी रिकॉर्ड से कहीं ज्यादा हो सकता है.


पिछले दस वर्षों के आंकड़े देखें तो छत्तीसगढ़ में टीबी मरीजों की संख्या लगातार बनी हुई है. 2015 में राज्य में 35,339 टीबी मरीज सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुए थे. यह संख्या 2018 में बढ़कर 43,031 और 2019 में 43,718 तक पहुंच गई. कोविड काल में 2020 में यह संख्या अचानक घटकर 29,339 हो गई, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब बीमारी कम होना नहीं था. 


उस समय जांच और रिपोर्टिंग दोनों प्रभावित हुई थीं. कोविड के बाद मरीजों की संख्या फिर बढ़ने लगी. 2021 में 32,416, 2022 में 38,521, 2023 में 38,924 और 2024 में 39,593 मरीज दर्ज किए गए. यानी कोविड के बाद भी टीबी का बोझ लगभग पहले जैसा बना हुआ है. 


स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी राज्य में टीबी मरीजों की मृत्यु दर ज्यादा होना कई गहरी समस्याओं की ओर इशारा करता है. रायपुर के डॉक्टर अभिजीत तिवारी कहते हैं-"पहली समस्या है मरीजों का देर से पकड़ में आना. छत्तीसगढ़ के बस्तर, जशपुर, कोरिया, कोंडागांव और कबीरधाम जैसे कई जिलों में बड़ी आबादी दूरस्थ इलाकों में रहती है. कई गांवों से जिला अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं. ऐसे में लोग तब तक जांच नहीं करवाते जब तक बीमारी गंभीर न हो जाए. टीबी जितनी देर से पकड़ में आती है, मौत का खतरा उतना ही बढ़ जाता है."


लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका शुक्ला मानती हैं कि राज्य में सबसे बड़ा संकट कुपोषण का है. वे कहती हैं- "टीबी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करती है और कमजोर शरीर बीमारी का मुकाबला नहीं कर पाता. विशेषज्ञ बताते हैं कि टीबी और कुपोषण एक-दूसरे को बढ़ाते हैं. गरीब परिवारों में मरीज इलाज के दौरान पर्याप्त पोषण नहीं ले पाते, जिससे हालत और खराब हो जाती है."


दवा बेअसर


प्रियंका शुक्ला का कहना है कि टीबी के मामले में सबसे बड़ी चिंता इलाज के बीच टूटने की है. सामान्य टीबी का इलाज भी कम से कम छह महीने चलता है. कई मरीज दवा बीच में छोड़ देते हैं, क्योंकि कुछ महीनों बाद उन्हें लगता है कि वे ठीक हो गए हैं. 


कुछ मामलों में दवाओं की नियमित उपलब्धता भी समस्या बनती है. इलाज अधूरा छूटने से बीमारी दोबारा लौट सकती है और कई बार दवाएं असर करना बंद कर देती हैं.


असल में इसी तरह की स्थिति के कारण ड्रग रेसिस्टेंट टीबी यानी एमडीआर टीबी का खतरा शुरु होता है. यह टीबी का वह रूप है जिसमें सामान्य दवाएं काम करना बंद कर देती हैं. इसका इलाज ज्यादा लंबा, महंगा और कठिन होता है. उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में एमडीआर /आरआर-टीबी मरीजों की संख्या 2020 में 316 थी, जो 2021 में बढ़कर 376 और 2022 में 450 तक पहुंच गई. यानी सिर्फ दो वर्षों में लगभग 42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई.


विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकेत बताता है कि राज्य में अधूरा इलाज और संक्रमण की समस्या गंभीर हो सकती है.


मृत्यु दर


विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत अब भी दुनिया के सबसे ज्यादा टीबी बोझ वाले देशों में शामिल है. 2023 में भारत में अनुमानित टीबी दर 195 प्रति लाख आबादी रही. 


हालांकि पिछले दस वर्षों में देश की कुल टीबी मृत्यु दर धीरे-धीरे घटी है. 2014 में भारत में टीबी मृत्यु दर 30 प्रति लाख आबादी थी, जो 2023 में घटकर 22 प्रति लाख हो गई. 


लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मरीजों के बीच मृत्यु दर अभी भी राष्ट्रीय चिंता का विषय बनी हुई है. छत्तीसगढ़ के मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या राज्य में बड़ी संख्या में मरीज अब भी सरकारी रिकॉर्ड से बाहर हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि किसी राज्य में नोटिफिकेशन रेट अपेक्षाकृत कम हो लेकिन मृत्यु दर ज्यादा हो, तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि कई मरीज समय पर सिस्टम तक पहुंच ही नहीं पा रहे. यानी बीमारी की असली तस्वीर सरकारी आंकड़ों से बड़ी हो सकती है.


विशेषज्ञों के अनुसार अब केवल टीबी मरीज खोजने से समस्या हल नहीं होगी. असली चुनौती यह है कि मरीजों को समय पर जांच मिले, इलाज बीच में न टूटे, पर्याप्त पोषण मिले और दूरस्थ इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचें. साथ ही ड्रग रेसिस्टेंट टीबी को रोकने के लिए दवाओं की नियमित उपलब्धता और निगरानी बेहद जरूरी है.


छत्तीसगढ़ की मौजूदा तस्वीर यही कहती है कि बीमारी अभी खत्म नहीं हुई है. मरीजों की संख्या जितनी चिंता की बात है, उससे कहीं ज्यादा चिंता इस बात की है कि इलाज के लिए दर्ज मरीजों में मौतें अभी भी इतनी ज्यादा क्यों हो रही हैं. जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक टीबी मुक्त के सरकारी दावे अधूरे ही माने जाएंगे.


*इस रिपोर्ट में निजता का सम्मान करते हुए मृतक और उसके पिता का नाम बदल दिया गया है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP