कलकत्ता HC की सख्त टिप्पणी के बाद छत्तीसगढ़ में डिटेन 4 बंगाली मजदूर रिहा
बिलासपुर । संवाददाता: कलकत्ता हाईकोर्ट के कड़े रुख और प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाने के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने पश्चिम बंगाल के चार प्रवासी मजदूरों को रिहा कर दिया है. ये मजदूर बीते एक महीने से अधिक समय से संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में रायपुर स्थित होल्डिंग सेंटर में डिटेन थे. उच्च न्यायालय द्वारा मामले में अधिकारियों और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सवाल खड़े किए जाने के तुरंत बाद, बुधवार रात लगभग 9 बजे चारों मजदूरों साबिर शेख, शफीकुल इस्लाम, नसीरुद्दीन शेख और लालटू शेख को अचानक रिहा कर दिया गया.
अदालत का कड़ा सवाल और प्रशासन की भूमिका
सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्ण राव की पीठ ने बिलासपुर पुलिस अधीक्षक, जो फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (FRO) भी हैं, की शक्तियों और निर्णय पर सवाल उठाए. हाईकोर्ट ने राज्य प्रशासन के 'दोहरे रवैये' पर नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब इन व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के खिलाफ अपील न्यायाधिकरण में लंबित है, तो पुलिस या एफआरओ उनकी नागरिकता का फैसला खुद कैसे कर सकते हैं? अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मामला ट्रिब्यूनल के समक्ष विचाराधीन है, तब इस प्रकार की समानांतर कार्रवाई विरोधाभासी और पूरी तरह से अनुचित है.
विशेष गहन पुनरीक्षण और पूरी घटना का घटनाक्रम
यह पूरा विवाद सितंबर की शुरुआत में शुरू हुआ था, जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने बिलासपुर के सिरगिट्टी थाना क्षेत्र से मुर्शिदाबाद जिले के 23 प्रवासी मजदूरों को हिरासत में लिया था. ये लोग वहां फेरी लगाकर सामान बेचने और मजदूरी का काम कर रहे थे. इनमें से 19 मजदूरों को स्थानीय अदालत के आदेश के बाद 18 सितंबर को ही रिहा कर दिया गया था क्योंकि अप्रैल में उनकी नागरिकता संबंधी प्रक्रिया पूरी हो गई थी. हालांकि, बाकी बचे चार मजदूरों के नाम विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से कट गए थे, जिसकी बहाली के लिए उन्होंने अपील दायर की हुई है.
प्रशासनिक देरी और राजनीतिक प्रतिक्रिया
मामले में मोड़ तब आया जब छत्तीसगढ़ प्रशासन ने मुर्शिदाबाद के जिला मजिस्ट्रेट से मजदूरों की नागरिकता सत्यापन रिपोर्ट मांगी, लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन की ओर से समय पर जवाब नहीं मिला. प्रशासनिक देरी से परेशान होकर परिजनों को कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. इस घटनाक्रम पर तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद समीरुल इस्लाम ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अधिकारियों से अपील की कि वे ऐसे सत्यापन मामलों में बिना किसी राजनीतिक विचार के जिम्मेदारी से काम करें. उन्होंने कहा कि समय पर प्रशासनिक मदद न मिलने के कारण ही परिवारों को अदालत की शरण लेनी पड़ी, जहां से उन्हें अंततः न्याय मिला.