युद्ध, सूखा और महंगे मालभाड़े से 2027 तक बढ़ सकती है महंगाई
युद्ध-जनित शिपिंग व्यवधानों, अल-नीनो के कारण सूखे और बढ़ती इनपुट लागतों की वजह से दुनिया भर में खाद्य वस्तुएं महंगी हो रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य मुद्रास्फीति का यह दबाव 2027 तक जारी रह सकता है.
नई दिल्ली । डेस्क: वैश्विक बाज़ारों में खाद्य सामग्रियों की कीमतें एक बार फिर तेजी से बढ़ने लगी हैं और आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह संकट वर्ष 2027 तक जारी रह सकता है. युद्ध के कारण बाधित समुद्री आपूर्ति नेटवर्क और अल-नीनो के प्रभाव से उत्पन्न सूखे की स्थिति ने अनाज उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है. इस दोहरे दबाव का सबसे भारी बोझ निम्न और मध्यम आय वाले देशों के आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जहां पारिवारिक आय का एक बड़ा हिस्सा केवल भोजन पर खर्च होता है.
इंडोनेशिया में चावल की कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गई हैं, मिस्र में ब्रेड के दाम एक-चौथाई बढ़ चुके हैं, जबकि भारत में मॉनसून की बेरुखी के कारण चीनी, प्याज और दालों जैसी आवश्यक वस्तुओं के भाव उछल रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, सितंबर में खाद्य मूल्य सूचकांक 136 अंक पर पहुंच गया है, जो पिछले दो वर्षों का उच्चतम स्तर है.
बहुकोणीय आपूर्ति बाधाएं और बढ़ती उत्पादन लागत
खाद्य पदार्थों की कीमतों में यह तीव्र उछाल कई समकालिक वैश्विक झटकों का परिणाम है. काला सागर और लाल सागर क्षेत्र में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने गेहूं और अन्य अनाजों के परिवहन को महंगा और जटिल बना दिया है. जहाजों को लंबे और खर्चीले मार्गों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे वैश्विक मार्गों पर मालभाड़ा दरें लगभग पचास प्रतिशत तक बढ़ गई हैं. इसके अतिरिक्त, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण ईंधन और उर्वरक के दाम ऊंचे बने हुए हैं, जिससे किसानों की कृषि लागत में सीधी वृद्धि हुई है.
घटता बफर और मुद्रा का अवमूल्यन
विगत वर्षों के बंपर उत्पादन और वैश्विक अनाज भंडार के आधार पर अब तक कीमतों को कुछ सीमा तक नियंत्रित रखा गया था, परंतु अब यह बफर भी समाप्त हो रहा है. खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां अब महंगे अनुबंधों पर कच्चे माल की खरीदारी कर रही हैं. इसके साथ ही, कई देशों की स्थानीय मुद्राओं में आ रही गिरावट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. कमजोर होती स्थानीय मुद्रा के कारण आयातित खाद्य सामग्री और परिवहन की लागत कई गुना बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर अंतिम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है.
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव का खतरा
खाद्य मुद्रास्फीति के इस नए चक्र ने समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग की आजीविका को संकट में डाल दिया है. दैनिक वेतनभोगियों और कम आय वाले परिवारों को अपने दैनिक भोजन में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. आने वाले महीनों में प्रमुख आयातक देशों द्वारा बाज़ार से बड़ी मात्रा में खरीदारी शुरू करने की संभावना है, जिससे वैश्विक मांग का एक नया दबाव बनेगा. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि निर्यात पर प्रतिबंध लगाए गए या उत्पादन में सुधार नहीं हुआ, तो यह स्थिति सामाजिक अशांति और वैश्विक खाद्य असुरक्षा को और गहरा कर सकती है.