प्रदर्शन में केवल मौजूदगी अपराध नहीं: FIR रद्द करते हुए दिल्ली HC की टिप्पणी
रामलीला मैदान प्रदर्शन मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी विरोध प्रदर्शन में केवल शामिल होना 'समान मंशा' या अपराध का प्रमाण नहीं है. हाईकोर्ट ने एसएससी अभ्यर्थी के खिलाफ दर्ज FIR को खारिज करते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय के अधिकार को सर्वोपरि माना.
नई दिल्ली । डेस्क: दिल्ली हाईकोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों में नागरिकों के अधिकारों और कानूनी सीमाओं को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय दिया है. अदालत ने रामलीला मैदान में हुए एक प्रदर्शन के दौरान एसएससी (SSC) अभ्यर्थी के खिलाफ दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) को निरस्त कर दिया.
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी प्रदर्शन स्थल पर केवल उपस्थित होना या भीड़ का हिस्सा बनना ही किसी व्यक्ति को अपराधी ठहराने या उस पर मुकदमा चलाने का आधार नहीं हो सकता, जब तक कि उसके खिलाफ किसी विशिष्ट अपराध का प्रत्यक्ष प्रमाण न हो.
न्यायमूर्ति संजीव नरूला की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि पुलिस की शिकायत और उसके बाद दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी प्रकार के आपराधिक आचरण या हिंसा का कोई विशिष्ट उल्लेख नहीं है. अदालत ने माना कि किसी प्रदर्शन में केवल भागीदारी से यह सिद्ध नहीं होता कि व्यक्ति की मंशा पुलिस के निर्देशों की अवहेलना करने या उनके काम में बाधा डालने की थी.
यह मामला पिछले वर्ष अगस्त माह का है, जब एसएससी प्रवेश परीक्षा में कथित अनियमितताओं के विरोध में राजधानी के रामलीला मैदान में अभ्यर्थियों द्वारा विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया था.
पुलिस का आरोप था कि आयोजकों और कुछ प्रदर्शनकारियों ने अनुमति का समय समाप्त होने के बाद भी मैदान खाली करने से इनकार कर दिया और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया.
पुलिस ने यह भी दावा किया था कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की, जिसके आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223(a) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी.
हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 223(a) के तहत किसी को दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि व्यक्ति को सरकारी आदेश की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उसकी अवहेलना की.
पीठ ने अपने आदेश में कहा, "केवल प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद होने के कारण किसी नागरिक को आपराधिक कार्यवाही में नहीं घसीटा जा सकता. रिकॉर्ड में उपलब्ध साक्ष्य याचिकाकर्ता की किसी भी आपराधिक मंशा को साबित नहीं करते. ऐसे में उसके खिलाफ कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा."
अदालत का यह फैसला लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के दृष्टिकोण से एक बड़ा नजीर माना जा रहा है.