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दक्षिण हिंद महासागर के खारेपन में भारी गिरावट, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

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12 मार्च 2026, 05:14 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

समुद्र
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नई दिल्ली । डेस्क: दक्षिणी गोलार्ध का सबसे नमकीन हिस्सा माना जाने वाला दक्षिण हिंद महासागर अब अपनी पहचान खो रहा है. दशकों से समुद्र विज्ञानियों के लिए शोध का केंद्र रहे इस महासागरीय क्षेत्र में नमक की मात्रा में अप्रत्याशित कमी दर्ज की गई है. 


कोलोराडो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा किए गए व्यापक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि पिछले 60 वर्षों के भीतर इस क्षेत्र के जल में नमक का स्तर लगभग 30 प्रतिशत तक गिर गया है. यह बदलाव न केवल समुद्री जीव विज्ञान के लिए चिंता का विषय है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु तंत्र में आने वाले किसी बड़े संकट की आहट भी हो सकता है.

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ऐतिहासिक रूप से, दक्षिण हिंद महासागर अपनी प्रखर सूर्य की किरणों और तीव्र वाष्पीकरण के लिए जाना जाता था. पानी के तेजी से भाप बनने के कारण यहाँ नमक का घनत्व काफी अधिक रहता था, जिससे यह दक्षिणी गोलार्ध का सबसे खारा समुद्री क्षेत्र बन गया था. 


19वीं शताब्दी के मध्य से ही वैज्ञानिक इस खारेपन के आधार पर समुद्री धाराओं की गति और दिशा का सटीक आकलन करते आए हैं. लेकिन हालिया शोध के आंकड़े बताते हैं कि अब यहाँ की पारिस्थितिकी तेजी से बदल रही है.


वैज्ञानिकों ने अपनी जांच में पाया कि यह कमी अचानक नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे 'इंडो-पैसिफिक फ्रेशवॉटर पूल' नामक एक विशाल जलाशय का हाथ है. यह जलाशय भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर से लेकर पूर्वी हिंद महासागर तक फैला हुआ है, जहाँ भारी और निरंतर वर्षा के कारण समुद्र की ऊपरी सतह का पानी काफी मीठा (कम खारा) रहता है. 


शोधकर्ताओं के अनुसार, वैश्विक 'वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर्न' (Atmospheric Circulation Patterns) में आए व्यापक बदलावों की वजह से समुद्री धाराओं का रुख मुड़ गया है. इसके परिणामस्वरूप, उस विशाल जलाशय का कम खारा पानी अब तेजी से दक्षिण हिंद महासागर के उन क्षेत्रों में प्रवेश कर रहा है, जहाँ पहले खारेपन की प्रधानता थी.


इस बदलाव के दूरगामी और विनाशकारी प्रभाव हो सकते हैं. 


समुद्र के पानी का खारापन सीधे तौर पर उसके घनत्व को प्रभावित करता है. पानी का घनत्व ही वह कारक है जो समुद्री धाराओं की गति को नियंत्रित करता है. यदि पानी का खारापन कम होता है, तो उसकी सघनता कम हो जाएगी, जिससे समुद्री धाराओं का प्रवाह धीमा पड़ सकता है. 


चूंकि दुनिया भर का मौसम और वर्षा चक्र इन समुद्री धाराओं पर ही निर्भर करता है, इसलिए वैज्ञानिक इसे एक बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं. 


उदाहरण के तौर पर, हवा के संचार पैटर्न में बदलाव के कारण पहले ही अमेज़न के वर्षावनों में बारिश में 40 प्रतिशत की कमी देखी जा चुकी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि दक्षिण हिंद महासागर के खारेपन में आ रही यह कमी भविष्य में मानसून और वैश्विक तापमान को अनिश्चित तरीके से प्रभावित कर सकती है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP