सलवा जुडूम विस्थापित: धर्म परिवर्तन के विवाद में उलझी 52 परिवारों की गांव वापसी
सुकमा । संवाददाता: सलवा जुडूम और नक्सल हिंसा के दौर में अपना घर-बार छोड़ने को मजबूर हुए 52 आदिवासी परिवारों के 301 ग्रामीणों ने एक बार फिर अपने मूल गांव लौटने की गुहार लगाई है. गुरुवार को इन विस्थापित ग्रामीणों ने सुकमा जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और अपनी जमीन व समाज के बीच दोबारा बसने की मांग की.
हालांकि, इस बार गांव वापसी की राह में नक्सली खौफ नहीं, बल्कि धर्म परिवर्तन से उपजा सामाजिक विवाद आड़े आ रहा है.
विस्थापित ग्रामीणों के अनुसार, सलवा जुडूम के दौरान उन्हें सुकमा के मिलमपल्ली गांव से पलायन कर आंध्र प्रदेश के लक्ष्मीपुरम और अन्य सीमावर्ती इलाकों में शरण लेनी पड़ी थी. अब जब क्षेत्र में हालात सामान्य हो रहे हैं, तो वे अपने वतन लौटना चाहते हैं. लेकिन मिलमपल्ली गांव के कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने उनके सामने दोबारा आदिवासी समाज में शामिल होने की शर्त रख दी है.
आरोप है कि ये परिवार लगभग 1997 के आसपास ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे, जिसके कारण अब गांव का एक धड़ा इन्हें अपनाने का विरोध कर रहा है और मसीही धर्म छोड़ने का दबाव बना रहा है.
यह मामला अब केवल पुनर्वास का न रहकर संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संघर्ष का रूप ले चुका है. भारतीय संविधान के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद के धर्म को मानने की आजादी है, जिसके चलते इस विवाद ने कानूनी और मानवीय बहस को जन्म दे दिया है.
बस्तर की जानी-मानी आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी ने इस संवेदनशील मामले में मध्यस्थता की पहल की है. उन्होंने विस्थापित परिवारों से मुलाकात कर उनके अधिकारों का समर्थन किया है और जल्द ही वे मिलमपल्ली गांव जाकर दूसरे पक्ष से भी बातचीत करेंगी ताकि कोई शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सके.
हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बस्तर दौरे पर क्षेत्र से नक्सलवाद के खात्मे और विकास के दावे किए थे, लेकिन मिलमपल्ली के इन 52 परिवारों की स्थिति बयां करती है कि दशकों पुराने विस्थापन का दर्द और सामाजिक दूरियां आज भी बस्तर के आदिवासियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और सामाजिक संगठनों के प्रयास इन परिवारों को उनके हक की जमीन और सामाजिक पहचान वापस दिला पाते हैं या नहीं.