DNA टेस्ट में पिता साबित न होने पर बच्चे को गुजारा भत्ता देना जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि डीएनए टेस्ट से यह साबित हो जाता है कि व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो वह अलग रह रही पत्नी के उस बच्चे को गुजारा भत्ता देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें गैर-जैविक बच्चे के लिए भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया गया था.
इस मामले में महिला ने अपने और अपने बच्चे के लिए 25,000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग की थी. हालांकि, डीएनए परीक्षण में यह पुष्टि हुई कि पति बच्चे का जैविक पिता नहीं है और महिला ने इस रिपोर्ट को कभी चुनौती भी नहीं दी.
अदालत ने कहा कि जब डीएनए रिपोर्ट अंतिम रूप ले चुकी है और सहमति से बनी है, तो इसमें कोई त्रुटि नहीं पाई जा सकती.
हालांकि, शीर्ष अदालत ने पत्नी के स्वयं के भरण-पोषण के मामले को निचली अदालत में पुनर्विचार के लिए भेजने के हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया. इसके साथ ही, कोर्ट ने बच्चे के भविष्य और कल्याण पर चिंता जताते हुए दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया है कि वे बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी जरूरतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाएं.